प्रयागराज : राज्य की स्थानांतरण नीति के उल्लंघन के आधार पर स्थानांतरण आदेश को याचिका में चुनौती नहीं दी जा सकती

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अमृत विचार, प्रयागराज । इलाहाबाद हाईकोर्ट ने स्थानांतरण के एक मामले में कहा कि राज्य की नीति के उल्लंघन में कथित रूप से पारित किए गए स्थानांतरण आदेश को याचिका में चुनौती नहीं दी जा सकती है, क्योंकि इससे कोई वैधानिक अधिकार प्रभावित नहीं होता है। राज्य की नीतियां प्रशासनिक प्रकृति की होती हैं और विधायिका द्वारा बनाए गए वैधानिक कानून से अलग होती हैं।

न्यायमूर्ति जे जे मुनीर ने अमित कुमार की याचिका पर विचार करते हुए कहा कि स्थानांतरण वास्तव में सेवा की अनिवार्यता है और संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत ऐसे मामलों में न्यायालय द्वारा हस्तक्षेप केवल तभी स्वीकार्य है, जब स्थानांतरण वास्तव में दुर्भावना से प्रेरित हो या स्थानांतरण आदेश में वैधानिक नियम का उल्लंघन हो। हालांकि न्यायालय किसी भी स्थिति में राज्य की स्थानांतरण नीति के उल्लंघन के आधार पर स्थानांतरण आदेश में हस्तक्षेप नहीं कर सकता है।

मालूम हो कि याची निदेशक सहकारी समितियां और पंचायत लेखा परीक्षा, लखनऊ, यूपी के कार्यालय में एक वरिष्ठ लेखा परीक्षक के रूप में कार्यरत हैं। उन्हें सार्वजनिक हित में स्थानांतरण आदेश जारी किया गया था। उन्होंने इस आधार पर स्थानांतरण आदेश का विरोध किया कि उनकी पत्नी एक सरकारी प्राथमिक विद्यालय में सहायक शिक्षिका हैं और हाल ही में उनकी वर्तमान पोस्टिंग पर पत्नी को स्थानांतरित कर दिया गया था, जिससे पति-पत्नी एक ही जिले में रहकर सेवारत रहें ।

गौरतलब है कि वर्ष 2022-23 के लिए राज्य सरकार की स्थानांतरण नीति में प्रावधान है कि अगर पति-पत्नी सरकारी रोजगार में है तो जहां तक संभव हो, उन्हें एक ही जिले, शहर या स्टेशन पर तैनात करने के लिए स्थानांतरण किया जा सकता है। याची के अधिवक्ता ने तर्क दिया कि याची का 200 किलोमीटर दूर स्थानांतरण मनमाना और पिक और चॉइस नीति पर आधारित था।

सुप्रीम कोर्ट द्वारा निर्धारित कानून का हवाला देते हुए कोर्ट ने माना कि अगर राज्य की स्थानांतरण नीति प्रशासनिक प्रकृति की है और वैधानिक नियमों से भिन्न है, इसलिए नीति का उल्लंघन सरकारी कर्मचारियों को इस अदालत के समक्ष चुनौती देने का कोई अधिकार नहीं देगा। अतः वर्तमान मामले में किसी वैधानिक नियम का कोई उल्लंघन नहीं किया गया है, इसलिए न्यायालय ने स्थांतरण आदेश में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया। हालांकि याची को संबंधित अधिकारियों के समक्ष अपनी शिकायतें उठाने का अवसर दिया गया है।

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