मणिपुर पर पक्ष-विपक्ष
मणिपुर मुद्दे पर संसद में अविश्वास प्रस्ताव की रणनीति से विपक्ष सरकार को कटघरे में खड़ा करने के अपने मंसूबे में सफल होता दिख रहा है। अविश्वास प्रस्ताव का भविष्य पहले से तय होने के साथ, लोकसभा में भाजपा के अजेय बहुमत को देखते हुए, केवल इस बात को लेकर कौतुहल बना रहा कि क्या प्रधानमंत्री बहस का जवाब देने से पहले उपस्थित होंगे या नहीं।
लोगों में भी प्रस्ताव पर चल रही बहस को लेकर उत्सुकता देखी जा रही है। पिछले दिनों उच्चतम न्यायालय ने अपनी कड़ी टिप्पणियों से यह स्पष्ट कर दिया था कि मणिपुर में पिछले तीन महीनों से भी अधिक समय से जारी अराजकता की स्थिति से निपटने में राज्य सरकार के प्रयास नाकाफी थे और वहां किस तरह से दखल देने की जरूरत थी।
हालांकि शीर्ष अदालत ने जो किया वह मूलत: कार्यपालिका की जिम्मेदारी थी। मंगलवार को कांग्रेस सांसद गौरव गोगोई की ओर से लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर चर्चा के दौरान विपक्षी सांसदों ने कोशिश की कि मणिपुर में नाकामी को लेकर सीधे-सीधे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को घेरा जाए।
उम्मीद थी कि मणिपुर को लेकर सरकार पर लगे आरोपों पर तथ्यों के साथ सत्ता पक्ष के सांसदों की ओर से पलटवार किया जाएगा। लेकिन सत्ता पक्ष की ओर से सांसद मणिपुर के मौजूदा हालात पर नहीं बल्कि मणिपुर के इतिहास पर बोले। बुधवार को चर्चा की शुरुआत हुई तो रणनीति में न तो विपक्ष की ओर से कोई बदलाव दिखा और न ही सत्ता पक्ष की ओर से। राहुल गांधी ने सरकार के खिलाफ विपक्ष का नेतृत्व किया। भाजपा की ओर से केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह व स्मृति ईरानी चर्चा में शामिल रहीं।
राहुल गांधी दूसरे दिन पहले वक्ता के रूप में मणिपुर को लेकर पुराने तेवर में ही दिखे। उन्होंने अपने लंबे और तीखे भाषण में मणिपुर के अपने दौरे के अनुभव सुनाते हुए प्रधानमंत्री की आलोचना की। एनडीए और अविश्वास प्रस्ताव पर सरकार के पक्ष में खड़े दलों के सांसदों का जोर केंद्र सरकार की उपलब्धियां गिनाने पर रहा। गृहमंत्री ने प्रस्ताव को राजनीति से प्रेरित बताया।
संसद का मानसून सत्र 11 अगस्त तक ही चलेगा। गुरुवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अविश्वास प्रस्ताव पर चर्चा का जवाब देंगे। सबकी उम्मीदें इस पर टिकी हैं कि मणिपुर की हिंसा की जवाबदेही को लेकर प्रधानमंत्री क्या कहते हैं। महत्वपूर्ण है कि प्रस्ताव पर चर्चा से संसद की सार्थकता सिद्ध है। उम्मीद है कि गुरुवार को होने वाली बहस आम लोगों में विश्वास पैदा करने वाली होगी। जनता का विश्वास ही लोकतंत्र की सफलता की गारंटी होता है।
