मानसिक स्वास्थ्य की उपेक्षा
देश के लोग व्यापक मानसिक स्वास्थ्य संकट का सामना कर रहे हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन की एक रिपोर्ट के अनुसार करीब 7.5 फीसदी भारतीय किसी न किसी मानसिक बीमारी से ग्रस्त हैं। आत्महत्या स्वास्थ्य संकट का अंतिम संकेत है। आत्महत्या एक त्रासदी है। यह समाज व परिवार से जुड़े लोगों के जीवन को बुरी तरह …
देश के लोग व्यापक मानसिक स्वास्थ्य संकट का सामना कर रहे हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन की एक रिपोर्ट के अनुसार करीब 7.5 फीसदी भारतीय किसी न किसी मानसिक बीमारी से ग्रस्त हैं। आत्महत्या स्वास्थ्य संकट का अंतिम संकेत है। आत्महत्या एक त्रासदी है। यह समाज व परिवार से जुड़े लोगों के जीवन को बुरी तरह प्रभावित करती है। हमारे देश में हर साल एक लाख से अधिक लोग आत्महत्या करते हैं।
राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो द्वारा जारी नवीनतम आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2019 में भारत में कुल 1,39,123 आत्महत्याएं दर्ज की गईं जो 2018 से 3.4 प्रतिशत अधिक रहीं। संभव है कि वास्तविक आंकड़े कहीं अधिक हों। बेरोजगारी के चलते बड़ी संख्या में आत्महत्या की घटनाएं हुईं। बताया जा रहा है कि आत्महत्या करने वाले लोगों में लगभग 10.1 प्रतिशत बेरोजगार थे। यह संख्या 2018 की तुलना में 8.37 प्रतिशत अधिक है। इसमें दिहाड़ी मज़दूरों की संख्या लगभग एक चौथाई है। इसके बाद गृहिणियों द्वारा आत्महत्या के सर्वाधिक मामले आए हैं।
परामर्शदाताओं की कम संख्या भी इस समस्या में एक बड़ी भूमिका निभाती है। भारत में हर दस लाख लोगों के लिए सिर्फ तीन मनोचिकित्सक और उससे भी कम मनोवैज्ञानिक हैं। यह स्पष्ट है कि महामारी से प्रेरित चिंताओं और सामाजिक अलगाव ने लोगों को अवसाद की ओर धकेल दिया है। अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन के एक अध्ययन में पाया गया कि दुनिया भर में दो में से एक युवा चिंता और अवसाद के अधीन है। आत्महत्याओं को समय पर हस्तक्षेप से रोका जा सकता है। दशकों से मानसिक स्वास्थ्य की अनदेखी करने का नतीजा हमारे सामने है। हालांकि इसके लिए वर्ष 2017 में मानसिक स्वास्थ्य अधिनियम लागू किया चा चुका है।
अधिनियम का मुख्य उद्देश्य मानसिक रोगों से ग्रसित लोगों को मानसिक स्वास्थ्य सुरक्षा और सेवाएं प्रदान करना है। साथ ही यह अधिनियम मानसिक रोगियों की गरिमा के साथ जीवन जीने के अधिकार को भी सुनिश्चित करता है। कुछ अनुमानों के अनुसार, मानसिक स्वास्थ्य अधिनियम के राष्ट्रव्यापी कार्यान्वयन के लिए प्रति वर्ष 94 हजार करोड़ रुपये खर्च होंगे। आज सबसे अधिक महत्वपूर्ण है कि मानसिक स्वास्थ्य की उपेक्षा की प्रवृत्ति से उबरना होगा। जागरुकता पैदा करनी होगी कि जिस प्रकार शारीरिक रोग हमारे लिए हानिकारक हो सकते हैं उसी प्रकार मानसिक रोग भी हमारे स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव डाल सकते हैं।
