भारत-चीन आध्यात्मिक संबंधों की बहाली के लिए यज्ञ का हुआ आयोजन
तिरुवनंतपुरम। भारत और चीन के बीच आध्यात्मिक संबंधों को पुनर्जीवित करने और समकालीन भू राजनीति में भारत के अनुकूल वातावरण बनाने के उद्देश्य से तमिलनाडु में डिंडिगुल जिले के पलानी में भगवान मुरुगा मंदिर परिसर में स्वतंत्रता दिवस पर एक यिन यांग (शिव शक्ति) यज्ञ का आयोजन किया गया।
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केरल के त्रिशूर के रहने वाले लाॅयन मयूरा रॉयल किंगडम (एलएमआरके) संगठन के संस्थापक रिजित कुमार ने बुधवार को बताया कि पूर्वी एशिया के देशों की भू-राजनीति को भारत के अनुकूल बनाने के लिए पंच भूतों और यिन-यांग (शिव-शक्ति) ऊर्जा के वायु (वायु) तत्व पर आधारित यज्ञ किया गया।
भारत एवं चीन के बीच आध्यात्मिक संबंधों की पृष्ठभूमि की चर्चा करते हुए रिजित कुमार ने कहा कि प्राचीन काल में भारत के योगी भोगर सिद्ध ने अपने आध्यात्मिक गुरू कलंगीनाथर की आज्ञा के अनुसार अपनी आत्मा को एक चीनी के शरीर में स्थानांतरित करके चीन में एक आध्यात्मिक मिशन शुरू किया था और उन्हें वहां लाओ त्सू के नाम से जाना जाने लगा।
अपना मिशन पूरा करने के बाद, लाओ त्सू अपने चीनी शिष्य यू (पुलिपानी सिद्धार) के साथ भारत लौट आए। कालांतर में भारत और चीन के बीच आध्यात्मिक संबंध समय के साथ विलोपित हो गया। अब, इस यज्ञ के माध्यम से दोनों देशों के बीच आध्यात्मिक संबंध को पुनर्जीवित करना है।
यह पूछे जाने पर कि उन्होंने यज्ञ करने के लिए पलानी को क्यों चुना, उन्होंने कहा कि पलानी में योगी भोगर सिद्ध द्वारा बनाई गई भगवान मुरुगा की मूर्ति ‘पदार्थ यानी मैटर’ से बनी है, और उनके द्वारा बनाई गई भगवान मुरुगा की दूसरी मूर्ति ‘एंटीमैटर’ की है। उन्होंने दिव्य स्त्री ऊर्जा (यिन) और दिव्य पुरुष ऊर्जा (यांग) को संतुलित करने के लिए इन मूर्तियों को रणनीतिक रूप से रखा - एक ऊपर (पदार्थ) और एक नीचे (एंटीमैटर) - और ऊर्जा के इस संतुलित प्रवाह से विश्व मामलों को प्रभावित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
रिजित कुमार ने सेवा-प्रेरित लोगों के लिए एक वैश्विक मंच बनाने और दुनिया में शांति और समृद्धि लाने के लिए 2017 में एलएमआरके की स्थापना की थी। उनके अनुसार लाॅयन मयूरा रॉयल किंगडम संगठन का उद्देश्य दुनिया में तमिल सभ्यता के महत्व और कुमारी कंदम के मंगल ग्रह से संबंध के बारे में जागरूकता पैदा करना है।
कुमारी कंदम एक पौराणिक महाद्वीप है जिसके बारे में माना जाता है कि यह प्राचीन तमिल सभ्यता के साथ लुप्त हो गया है। माना जाता है कि यह हिंद महासागर में वर्तमान भारत के दक्षिण में स्थित है। ‘शेर’ भगवान लक्ष्मीनरसिंह को विरुपित करता है, जो मंगल ग्रह के शासक हैं और ‘मयूर’ शब्द मुरुगा पेरुमन को संदर्भित करता है जो कुमारी कंदम के अधिष्ठाता देवता हैं।
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