शिक्षा और आत्महत्या

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Edited By Amrit Vichar
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यह एक स्थापित सत्य है कि शिक्षा समाज और व्यक्ति के उत्थान के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण तत्व है। शिक्षा से ही हम समाज और जीवन में मनचाहा मुकाम प्राप्त कर सकते हैं, लेकिन इधर कुछ दशकों से शिक्षा ने समाज में प्रतिस्पर्धा पूर्ण माहौल तैयार कर दिया है। इसके लिए किसी एक व्यक्ति को जिम्मेदार नहीं ठहरा जा सकता।

सारा समाज ही इसका दोषी है। शिक्षा में प्रतिस्पर्धा की वजह से बच्चों में ज्यादा नंबर लाने की होड़ लगी हुई है जिसके चलते विद्यार्थी पढ़ाई के दौरान इतना मानसिक दबाव में रहता है कि उसको लगने लगता है कि परीक्षा में कम नंबर आए तो समाज में उसे जगह नहीं मिलेगी या वह जीवन में कुछ कर नहीं पाएगा। इसी मानसिक दबाव में आकर छात्र ऐसा आत्मघाती कदम उठा लेते हैं जिसके बाद परिवार वालों के पास पछतावा के अलावा कुछ भी नहीं बचता। 

पिछले कुछ वर्षों से छात्र-छात्राओं के आत्महत्या संबंधी मामलों में तेजी से बढ़ोतरी हुई। देश का कोचिंग हब कहे जाने वाला राजस्थान का कोटा शहर इन दिनों आत्महत्या का हब बनता जा रहा है। बीते रविवार को 16 व 17 वर्षीय छात्रों ने कोचिंग टेस्ट में कम नंबर आने के कारण आत्महत्या कर ली।

एक छात्र ने कोचिंग संस्थान की छठी मंजिल से कूदकर तो दूसरे ने अपने हास्टल के कमरे में फंदा लगाकर जान दे दी। गौरतलब है कि इस वर्ष कोटा में आत्महत्या के अब तक 23 मामले आ चुके हैं जिसमें अगस्त महीने में ही सात छात्र-छात्राओं ने आत्महत्या की है।

यद्यपि राजस्थान सरकार ने इस मामले में पहले भी संज्ञान लेते हुए कोचिंग संचालकों को हिदायद दी थी कि टेस्ट पाबंदी लगाई जाए, लेकिन यहां सवाल यह उठता है कि क्या टेस्ट पर पाबंदी लगाना समस्या का हल है? बिल्कुल नहीं टेस्ट या परिक्षाएं शिक्षार्थी के स्वआंकलन का एक सशक्त जरिया होती हैं।

इस समस्या के समाधान के लिए हमें बच्चों पर अपनी अप्रत्याशित महत्वाकांक्षाएं थोपना बंद करना होगा। सही है कि प्रत्येक माता-पिता अपने बच्चे का उज्ज्वल भविष्य चाहता है,लेकिन उनको यह समझाना होगा की बच्चे पर उसकी क्षमताओं के अनुसार ही करियर का चुनने का दवाब हो। समाज को इस दिशा में सोचना होगा कि हर बच्चे को इंजीनियर, डॉक्टर या अफसर नहीं बनाया जा सकता।

शिक्षा मनोविज्ञान का कहना है कि हर बच्चा विशिष्ट है अर्थात् प्रत्येक बच्चे की अपनी विशिष्टताएं होती हैं उसी के अनुसार उसके भविष्य का निर्धारण करें। अन्यथा कि स्थिति में हम अपने बच्चों का भविष्य बनाने के बजाए बिगाड़ भी सकते हैं।