अंधविरोध से आगे बढ़े

Amrit Vichar Network
Edited By Amrit Vichar
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मोदी को हराने के लिए मुंबई में आईएनडीआईए की दो दिवसीय बैठक में मंथन जारी है। मंथन का निचोड़ क्या निकलेगा यह तब भी बताना आसान नहीं होगा जब बैठक समाप्त हो जायेगी, लेकिन बैठक के साथ ही जो बड़े-बड़े बोल विपक्षी नेताओं द्वारा बोले जा रहे हैं उनसे तो ऐसा ही लगता है कि उनका गठबंधन को मजबूत करने और 28 दलों के बीच पड़ी हुई गांठे खोलने की जगह मोदी को डरा हुआ बताकर खुद की जीत के दावों पर अधिक फोकस है। ऐसे दावे 2019 में भी सुनने को मिले थे। 

कांग्रेस ने तो तब मान ही लिया था कि मोदी की विदाई के साथ ही राहुल गांधी का प्रधानमंत्री बनना तय है। कुछ नेताओं ने अधिकारियों को धमकाते हुए कहा था कि उनकी सरकार आने वाली है तब उन्हें देख लिया जाएगा। वक्त ने ऐसा पलटा खाया कि कांग्रेस बुरी तरह चुनाव हार गयी। खुद राहुल गांधी, जो कहा करते थे कि मोदी उनसे डरते हैं, अपनी परम्परागत सीट अमेठी से चुनाव हार गए। इसलिए अभी से कोई भविष्यवाणी करना जल्दबाजी होगा और कांग्रेस के अधीर रंजन चौधरी या आईएनडीआईए के दलों के नेताओं का यह कहना कि मोदी उनके एलाइंस से डर गए, बड़े बोल के अलावा कुछ नहीं माना जा सकता।

बिडंबना यह कि यह बड़े बोल वे बोल रहे है जो भ्रष्टाचार के मामले में की जा रही कार्यवाही से खुद अंदर तक हिले हुए हैं और इसी भय ने उन्हें अपने उन धुर विरोधियों से हाथ मिलाने को मजबूर किया जिन्हें वे पहले फूटी आंख भी देखना पसंद नहीं करते थे। यह भी एक तथ्य है कि यह बड़े बोल तब भी बोले जा रहे हैं जब अभी नाम के अलावा गठबंधन की न कोई शक्ल उभर कर सामने आयी है और न ही कोई ऐसा एजेंडा बना है जिसे जनता के बीच मोदी सरकार के एजेंडे से बेहतर साबित किया जा सके। 

और तो और अभी गठबंधन दलों के नेता एक दूसरे के खिलाफ जो बयानबाजी कर रहे हैं वह भी संगठन की मजबूती पर सवालिया निशान लगाते हैं। मोदी के अंधविरोध के अलावा अभी तक ऐसा भी कुछ सामने नहीं आया जो आश्वस्त कर सके कि नया एलाइंस कुछ नयी तरह की राजनीतिक बुनियाद डालने वाला है। लोकतंत्र और संविधान खतरे में है का नारा अब धारदार नहीं रह गया है और न धर्मनिरपेक्ष बनाम साम्प्रदायिक के अलाप में कोई दम बचा है। 

अभी भी विपक्षी एकता खांटी मोदी विरोध पर टिकी है जबकि सफलता की तभी गुंजाइश हो सकती है जब खांटी विरोध से आगे बढ़ा जाए। इसलिए एलाइंस को कुछ नया खोजना होगा, कुछ नया नारा गढ़ना होगा अन्यथा इस कवायद के कोई अर्थ नहीं रह जायेंगे और अर्थहीन कवायद किस काम की।

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