विमर्श की आवश्यकता

Amrit Vichar Network
Edited By Amrit Vichar
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देश में लोकसभा व विधानसभा चुनाव एक साथ कराए जाने की बात लंबे समय से चल रही है। प्रधानमंत्री भी बीते वर्षों में विभिन्न अवसरों पर इस मुद्दे पर विमर्श करने का आवाहन करते आए हैं। इसके साथ ही निर्वाचन व विधि आयोग भी इस पर मंथन कर चुका है। बीते दिनों सरकार ने पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद की अध्यक्षता में आठ सदस्यीय समिति का गठन किया जो एक साथ चुनाव कराने के संबंध में अपने विचार देगी।

समिति के गठन के साथ ही देश में राजनीति भी गरमा चुकी है। विपक्षी पार्टियां सरकार के इस कदम को संविधान और संघीय ढांचे पर प्रहार मान रही हैं। पता नहीं देश की विपक्षी पार्टी किसी भी पहल के शुरू होते ही त्वरित निष्कर्ष पर कैसे पहुंच जाती हैं? विपक्षी नेताओं के विरोध का आलम यह है कि कांग्रेस के नेता अधीर रंजन चौधरी ने समिति में शामिल होने से ही मना कर दिया।

विपक्षी दलों को समझना चाहिए कि किसी भी योजना के लिए समिति बनते ही योजना का क्रियान्वयन नहीं हो जाता है, बल्कि समिति बनाई ही इसीलिए जाती है कि योजना के लाभ-हानि को समझा जा सके। गौरतलब है कि देश में साल भर किसी न किसी राज्य में चुनाव होते रहते हैं। यहां यह कहना ज्यादा उचित होगा कि देश हमेशा चुनावी मोड में रहता है। इसको देखते हुए सरकार की यह पहल स्वागत योग्य है।

अन्य दलों को भी यह समझना होगा कि लोकसभा और विधानसभाओं के चुनाव अलग-अलग समय पर कराने की वजह से सरकारी खजाने पर भारी बोझ पड़ता है। साथ ही देश के विकास कार्य भी बाधित होते हैं। वहीं सरकारी कर्मचारियों को भी इनकी तैयारियों और संपन्न कराने में काफी समय खर्च करना होता है। इस व्यवस्था से देश की सरकारी मशीनरी भी लंबे समय तक इंवाल्व नहीं रहेगी और देश के सार्वजनिक धन की बड़ी बचत होगी।

इसके साथ ही सरकार को भी इस योजना को लागू करने में जल्दी नहीं करनी चाहिए। योजना के प्रत्येक पहलू पर मंथन कर के बाद ही इस व्यवस्था को अमली जामा पहना होगा। यहां यह भी बात ध्यान रखनी होगी कि व्यवस्था के लागू होने के बाद फिर अगर आगे कभी लोकसभा या कोई विधानसभा अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर पाती और बीच में ही सरकार गिर जाती है, तो ऐसी स्थिति में क्या हो सकता है?

ऐसे में क्या मध्यावधि चुनाव के बजाय तब तक वैकल्पिक व्यवस्था लागू की जाएगी जब तक कि अगले चुनाव का समय नहीं आ जाता? ऐसा नियम बनाने से शासन-प्रणाली तो गड़बड़ा ही सकती है साथ ही विकास कार्यों में भी बाधा उत्पन्न हो सकती है, इसीलिए सरकार को इस व्यवस्था को स्वस्थ बहस और व्यापक विमर्श के बाद ही लागू करना चाहिए।