व्यर्थ का विवाद

Amrit Vichar Network
Edited By Amrit Vichar
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देश में एक देश एक चुनाव पर राजनीति अभी थम भी नहीं पाई थी कि देश के नाम को लेकर सियासत गरमा गई। जी-20 सम्मेलन के दौरान राष्ट्रपति भवन में आयोजित होने वाले रात्रि भोज के निमंत्रण पत्र में प्रेसिडेंट ऑफ इंडिया की जगह प्रेसिडेंट ऑफ भारत लिखे जाने को लेकर देश में राजनीतिक बहस जोरों पर है।

विपक्ष सरकार के खिलाफ लामबंद है उसका कहना है कि सरकार देश का नाम बदलना चाह रही है। विपक्ष को पता नहीं क्या हो गया है, ऐसा लगता है कि उसका एक मात्र एंजेडा सरकार की नीतियों और कामकाज का विरोध करना ही है। हालांकि यह गलत नहीं है, किंतु सरकार के हर काम का विरोध दर्शाता है कि विपक्ष सिर्फ विरोध की राजनीति पर ही आमादा है।

रात्रि भोज के निमंत्रण पर प्रेसिडेंट ऑफ भारत अंकित किए जाने पर विपक्ष तुरंत इस निष्कर्ष पर कैसे पहुंच गया कि सरकार देश का नाम बदल कर भारत करना चाह रही है। यही नहीं विपक्षी दल इस निष्कर्ष पर भी पहुंच गए कि 18-22 सितंबर के बीच आयोजित होने वाले संसद के विशेष सत्र में सरकार देश का नाम बदल कर भारत कर देगी।

गौरतलव है कि संविधान में इंडिया और भारत दोनों शब्दों का प्रयोग करने की अनुमति है और सरकार भी स्पष्ट कर चुकी है कि देश का नाम बदलने जैसी कोई मंशा नहीं है। विपक्षी पार्टियों को समझना चाहिए कि भारत नाम पहले से ही चलन में है तो इसमें नाम बदलने का कोई सवाल ही नहीं उठता है।

उसके बाद भी विपक्षी दलों का यह रवैया गैरजिम्मेदाराना होने के साथ-साथ निंदनीय भी है। गैरजिम्मेदारना इसलिए भी कि विपक्षी दलों ने हाल ही में हुई बैठक में अपने गठबंधन आइएनडीआइए के लिए यह नारा तैयार किया है कि ‘जुड़ेगा भारत-जीतेगा इंडिया’,उसके बाद भी विपक्ष का नाम को लेकर हाहाकार मचाना सरकार के अंधविरोध के अलावा कुछ भी नहीं दर्शाता है।

यही नहीं जब बीते वर्ष कांग्रेस के शीर्ष नेता राहुल गांधी ने भारत जोड़ो यात्रा की थी तब भी न कांग्रेस के किसी सदस्य को और न ही किसी विपक्षी दल को यात्रा के नाम में भारत शब्द प्रयोग करने पर कोई आपत्ति हुई थी। फिर विपक्ष का इस तरह सरकार द्वारा इंडिया के स्थान भारत शब्द के प्रयोग करने का विरोध समझ से परे है।

जहां तक नाम बदलने का प्रश्न है तो विपक्ष भी यह बात अच्छे से जानता समझता होगा कि संविधान में संशोधन के बिना देश का नाम नहीं बदला जा सकता है। देश में जी-20 सम्मेलन होने जा रहा है और देश उसकी अध्यक्षता कर रहा है। ऐसे में विपक्षी दलों को समझना चाहिए कि देश के नाम को लेकर इस तरह कि बेबुनियादी राजनीति से सम्मेलन में सम्मिलित होने वाले देशों के बीच नकारात्मक संदेश जाएगा जिससे देश की छवि पर बुरा असर होगा।