बरेली: इतनी आंखें न मूंदिए... आपके शहर में झूम रहा है बचपन
ओमेंद्र सिंह, बरेली, अमृत विचार। स्कूल, कॉलेज और फिर नौकरी की दौड़ के बीच नशा किशोरों और युवाओं के भविष्य के लिए कितनी बड़ी चुनौती बन चुका है, किसी भी स्तर पर इसका एहसास शायद उतना कहीं नहीं है जितना होना चाहिए। शहर के तीन नशामुक्ति केंद्रों के आंकड़े इसकी गंभीरता बयान कर रहे हैं। इन केंद्रों में नशे की लत से छुटकारा पहुंचने वालों में सबसे ज्यादा करीब 45 प्रतिशत संख्या 17 साल तक के किशोरों की है और युवाओं की 30 प्रतिशत तक।
स्वास्थ्य विभाग के आंकड़े और भयावह हैं जिनके मुताबिक जिले में नशे की वजह से हर साल औसतन पांच सौ लोग दम तोड़ रहे हैं, इनमें भी किशोरों और युवाओं की संख्या 40 फीसदी तक है। नशामुक्ति केंद्रों के रिकॉर्ड के मुताबिक जिले के किशोरों और युवाओं में सबसे ज्यादा लत सूखे नशे की है, जिसमें चरस, गांजा और भांग के साथ स्मोकिंग शामिल है। इसके अलावा तमाम युवा शराब और स्मैक जैसे नशे के भी शिकार हैं।
सबसे ज्यादा चिंतित करने वाली बात यह है कि इनमें अच्छी-खासी संख्या स्कूल और कॉलेज में पढ़ाई करने वाले किशोरों और युवाओं की भी है। नशे की अत्यधिक मात्रा उनके लिवर, किडनी और फेफड़ों पर भारी दुष्प्रभाव छोड़ती है और कुछ साल बाद अस्पताल पहुंचने की नौबत आ जाती है।
जिला अस्पताल के चेस्ट फिजिशियन डॉ. अजय मोहन अग्रवाल बताते हैं कि उनके पास अलग-अलग किस्म के नशे की लत के शिकार लोग इलाज कराने पहुंचते हैं। इनमें स्मोकिंग के घातक प्रभावों से जूझने वाले ही हर रोज छह से सात लोग होते हैं जिन्हें भर्ती करना पड़ता है। इनमें से हर महीने औसतन चार लोगों की मौत हो जाती है। इसी साल अब तक करीब 40 लोगों की मौत हो चुकी है।
तीन नशामुक्ति केंद्रों पर हर महीने ढाई सौ तक नए केस, इनमें सौ से ज्यादा किशोर, करीब 80 युवा
सुरेशशर्मा नगर में संकल्प नशा मुक्ति केंद्र के निदेशक प्रेम सिंह चौहान के अनुसार उनके केंद्र पर हर महीने औसतन 70 नए केस आते हैं। गंभीर बात यह है कि इनमें किशोरों की संख्या करीब 30 और युवाओं की करीब 25 होती है। बाकी 15 लोगों में अधेड़ और बुजुर्ग होते हैं जिन्हें उनके परिवार के लोग लेकर पहुंचते हैं।
उनके केंद्र पर पहले काउंसिलिंग के जरिए नशा छुड़ाने की कोशिश की जाती है।
जिन लोगों पर काउंसिलिंग का नतीजा नहीं निकलता तो उनका इलाज कराया जाता है। संजयनगर के मानव संसाधन नशामुक्ति केंद्र पर हर महीने नए केसों का औसत 50 से 60 बताया गया। यहां भी नशे के शिकार युवाओं और किशोरों का अनुपात वही होता है। लगभग यही स्थिति विष्णुधाम कॉलोनी में चल रहे निर्वाण नशामुक्ति केंद्र पर है। तीनों केंद्रों पर महीने का औसत दो सौ से ढाई सौ तक नए केस आने का है। तीनों केंद्रों के रिकॉर्ड के मुताबिक नशे की लत के शिकार होने वाले किशोरों और युवाओं की संख्या लगातार बढ़ भी रही है।
सिर चढ़कर बोल रहा है गांजा और चरस का नशा
संकल्प नशामुक्ति केंद्र के निदेशक प्रेम सिंह चौहान के मुताबिक करीब साल भर पहले तक उनके केंद्र पर आने वाले ज्यादातर युवा स्मैक के नशे की लत के शिकार होते थे। इनकी तादाद 60 प्रतिशत तक होती थी लेकिन अब गांजा और चरस का नशा करने वाले ज्यादा हैं। इसके अलावा कई लोग कफ सीरप जैसी अंग्रेजी दवाओं से नशा करने के आदी हो जाते हैं। इंजेक्शन के जरिए नशा करने वाले बमुश्किल तीन प्रतिशत ही होते हैं।
एक पहलू यह भी, नशे में थे सड़क हादसों में जान गंवाने वाले 30 फीसदी लोग
एक पहलू है कि जिले में सड़क हादसे बढ़ रहे हैं लेकिन दूसरा पहलू यह भी है कि तमाम सड़क हादसों की वजह भी नशा ही है। ट्रैफिक पुलिस के रिकॉर्ड के मुताबिक इस साल जिले में अब तक हुए सड़क हादसों में करीब 450 लोगों ने जान गंवाई है जिनमें दो सौ के आसपास नशे में थे।
600 के करीब ऐसे युवा जेल में बंद हैं जिन्होंने नशे की लत पूरी करने के लिए अपराध किया शहर से देहात तक करोड़ों का कारोबार
स्मैक तस्करी के लिए बरेली कितना कुख्यात हो चुका है, यह तो किसी से छिपा नहीं है। फतेहगंज पूर्वी, फरीदपुर, मीरगंज, फतेहगंज पश्चिमी और बहेड़ी समेत कई कस्बों में यह कारोबार फैला है। मेडिकल स्टोरों पर नशे की दवाएं बड़े पैमाने पर खपाए जाने के मामले भी आम हैं। शहर में गंगापुर, संजयनगर और हरूनगला समेत कई इलाके नशे के कारोबार के लिए बदनाम हैं।
इस पर भी करें गौर...
सुप्रीम कोर्ट को सरकार ने 14 दिसंबर 2022 को जानकारी दी थी कि देश में 10 से 17 साल की उम्र के 1.58 करोड़ बच्चे मादक पदार्थों के आदी हैं।
2019 से 2021 के बीच ड्रग संबंधी सबसे ज्यादा 31482 एफआईआर उत्तर प्रदेश में दर्ज की गईं। महाराष्ट्र दूसरे और पंजाब तीसरे नंबर पर था।
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