रजा लाइब्रेरी महोत्सव : बिखर जाएं तो हिन्दू, सिख, मुसलमां-जो मिल जाएं तो हम हिन्दोस्तान हैं...

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शायरों ने देर रात तक अपने कलाम से सामाईन को बांधे रखा, रजा लाइब्रेरी के 250 वर्ष पूर्ण होने पर किला मैदान में हुआ मुशायरा

रजा लाइब्रेरी के 250 वर्षीय जश्न के अवसर पर हुए मुशायरे में मंचासीन शायर।

रामपुर, अमृत विचार। विश्व प्रसिद्ध रजा लाइब्रेरी के 250 वर्ष पूर्ण होने पर रविवार की रात किला मैदान में हुए आल इंडिया मुशायरे में देर रात तक शायरों ने अपने कलाम से सामाईन (श्रोताओं) को बांधे रखा। मुशायरे की शमा रोशन होने के बाद शायरों ने कलाम पेश किए। निजामत कर रहे मंसूर उस्मानी ने शायरी का पेचो खम बताते हुए प्रसिद्ध शायर अजहर इनायती को दावते सुखन दी और तालियों की गड़गड़ाहट से मैदान गूंज उठा। 

किला मैदान में कुर्सियां सामाईन से खचाखच भरी हुई थीं और लंबे अरसे बाद रामपुर के लोग मुशायरे का लुत्फ ले रहे थे। शायरों के कलाम पेश करने के दौरान उन्हें कोई बाधा पसंद नहीं आ रही थी कोई कुर्सी पर खड़ा होता तो पीछे से आवाजें आने लगतीं कि बैठ जाइए। शायर अजहर इनायती ने कहा- बिखर जाएं तो हिन्दू, सिख, मुसलमां-जो मिल जाएं तो हम हिन्दोस्तां हैं। इसके बाद सामाईन की फरमाइश पर उन्होंने सुनाया- पहले हक गोई का किरदार दिया जाता है फिर कहानी में उसे मार दिया जाता है। इसके बाद मुशायरे के नाजिम ने प्रसिद्ध शायर ताहिर फराज को दावते सुखन दी।

उन्होंने कहा- एक मिसरा हूं मैं, एक मिसरा हो तुम दोनों मिल जाएं तो शेर हो जाएगा। इसके बाद उनकी गजल का यह शेर काफी पसंद किया गया। उन्होंने कहा- दोनों एक दूसरे पे मरते रहे कोई अल्लाह को प्यारा न हुआ, बे तकल्लुफ भी वह हो सकते थे हमसे ही कोई इशारा न हुआ। इसके बाद अकील नोमानी ने पढ़ा-प्यास के जिक्र को रखता हूं जुदा पानी से-देखते रहते हैं दरिया मुझे हैरानी से। उनकी खातिर मैं परेशान रहा करता हूं जिनको मतलब ही नहीं मेरी परेशानी से।

इसके बाद मुशायरे की नाजिम ने हंसाने और गुदगुदाने के लिए पॉपुलर मेरठी को आवाज दी और मैदान में तालियां गूंज उठीं पापुलर मेरठी ने पढ़ा-आशिकी भी दोस्तों क्या शास्त्रीय संगीत थी राग तोड़ी जाने क्या था जाने क्या गाते रहे। अजब नहीं है यह तुक्का भी तीर हो जाए फटे जो दूध तो फिर वह पनीर हो जाए। मवालियो को न देखा करो हिकारत से न जाने कौन से गुंडा वजीर हो जाए। जिंदगी भर इश्क का इजहार करने के लिए वह हकलाते रहे हम भी हकलाते रहे पर श्रोता हंसते-हंसते लोटपोट हो गए।

इसके बाद माहौल को संजीदा बनाने के लिए नाजिम ने अभिनव अभिन्न ने कहा- ठहरा रहा मैं और जमाना सफर में था सब छूटता रहा वो जो मेरी नजर में था। निजामत कर रहे मंसूर उस्मानी के इस शेर को खूब वाहवाही मिली मंजिलों की नजर में रहता हूं मैं हमेशा सफर में रहता हूं। एक बोझ है दिल पर जो उठा भी नहीं सकता क्या बोझ है दिल पर यह बता भी नहीं सकता।

प्रसिद्ध शायर मनीष शुक्ला ने दो टूक कहा और खूब वाहवाही पाई बात करने का हसीं तौर-तरीका सीखा-हमने उर्दू के बहाने से सलीका सीखा अब हमारे बीच दरवाजा नहीं दीवार है और कोई दीवार दस्तक से कभी खुलती है। नदीम शाद ने कहा इसी जमीन पे जालिम थे तुमसे पहले जो-इसी जमीन के अंदर कहीं पड़े होंगे। हमारी आंखों पे पलकें नहीं हैं बांध हैं यह-इन्हीं के पीछे समंदर कहीं पड़े होंगे। देर रात तक चले मुशायरे में मदन मोहन दानिश, शकील आजमी, डा.सोनरूपा विशाल, जिया जमीर और अमीर इमाम ने कलाम पेश किए। 

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