जमाखोरी का तंत्र
सब्जियों का साथी प्याज और टमाटर आम आदमी की थाली से फिर दूर हो गया है। प्याज, टमाटर के साथ ही आलू के दाम जिस तरह बढ़े हैं उससे महंगाई नियंत्रण के सरकार के दावों की पोल खुल रही है। आलू की सब्जी भी आम आदमी की जद से बाहर होती दिख रही है। कुछ …
सब्जियों का साथी प्याज और टमाटर आम आदमी की थाली से फिर दूर हो गया है। प्याज, टमाटर के साथ ही आलू के दाम जिस तरह बढ़े हैं उससे महंगाई नियंत्रण के सरकार के दावों की पोल खुल रही है। आलू की सब्जी भी आम आदमी की जद से बाहर होती दिख रही है। कुछ दिनों पहले 15 रुपये प्रति किग्रा तक बिकने वाला प्याज 50 और 20 रुपये किलो बिकने वाला आलू 40 रुपये प्रति किग्रा बिक रहा है। टमाटर के दाम भी 60 रुपये प्रति किग्रा तक पहुंच चुके हैं।
यह स्थिति तब है जब घरेलू बाजार में दाम सस्ते रखने के लिए सरकार ने निर्यात पर पूर्ण रूप से रोक लगा रखी है और देश में प्याज की पैदावार भी पिछले साल के मुकाबले ज्यादा हुई है। जब बाजार में प्याज पर्याप्त रूप से मौजूद हो, उसके निर्यात पर भी रोक हो और दाम आसमान छू रहे हों तो इसका सीधा अर्थ है कि सरकार का जमाखोरी और कालाबाजारी पर कोई नियंत्रण नहीं रह गया है। आखिर साल में एक बार ऐसा क्या होता है कि प्याज, टमाटर के दाम आसमान छूने लगते हैं, वह भी मानसून के ठीक बाद।
कालाबाजारी, जमाखोरी का यह कैसा तंत्र है जिसके आगे सरकारें फेल हैं। कृषि मंत्रालय के आंकड़े बताते हैं कि पिछले साल के मुकाबले देश में प्याज का उत्पादन करीब 23 लाख टन ज्यादा (251 लाख टन) हुआ है। बड़ी मंडियों में प्याज की आवक में कमी के चलते प्याज की आपूर्ति नहीं हो पा रही है। मार्च 2019 में दिल्ली में प्याज की आपूर्ति 33.34 हजार टन थी, इस साल मार्च में सिर्फ 20.61 हजार टन प्याज की आपूर्ति हुई है। यही कारण रहा कि प्याज के दामों में इतना उछाल आया है।
दरअसल जमाखोरों का तंत्र ही मंडी में आपूर्ति कम होने की स्थिति के लिए जिम्मेदार माना जाता है। आपूर्ति प्रभावित होते ही यही जमाखोर फिर प्याज की कालाबाजारी करते हैं। यह एक बना बनाया तंत्र है, मगर सब कुछ जानकारी में होने के बावजूद आखिर इन पर नियंत्रण क्यों संभव नहीं है, यह समझ से परे है। मानसून आते ही जून-अगस्त का महीना प्याज की खेती के लिए अहम रहता है और सितंबर आते ही प्याज की नई पैदावार बाजार में पहुंचने लगती है।
कालाबाजारियों को बाजार का पूर्वानुमान रहता है और वह फसल को मंडी पहुंचने के साथ-साथ स्टॉक करने लगते हैं। ज्यादातर बड़े किसान खुद इस काम को अंजाम देने में सक्षम रहते हैं और छोटे किसान पैदावार को मंडी ले जाने के खर्च से बचने के लिए कालाबाजारियों को सीधे बेच देते हैं। इस कुव्यवस्था पर लगाम लगाने के लिए सरकार को इंतजाम करने होंगे ताकि मानसून के बाद हर साल दाम बढ़ने के इस चलन पर रोक लगाई जा सके।
