जैतून को रास आई भीमताल की जलवायु, हरा भरा होकर देने लगा फल
भीमताल, अमृत विचार। उत्तराखंड की जलवायु पहली बार जैतून (ओलिया यूरोपिया) के वृक्ष को रास आई है। भीमताल में जैतून का वृक्ष हरा भरा ही नहीं हुआ बल्कि उसमें इन दिनों फल भी आए हैं। विशेषज्ञों की मानें तो 2006 की गणना में पूरे विश्व में मात्र 8.5 करोड़ जैतून के वृक्ष पेड़ हैं। उत्तराखंड में अब तक इस पेड़ की मौजूदगी कहीं दर्ज नहीं कराई गई है।
भीमताल में न केवल पेड़ उगा है बल्कि इसमें इन दिनों फल भी आए हैं। फूल पेड़ विशेषज्ञ के मुताबिक जैतून का पेड़ 2 से 4 करोड़ वर्ष पूर्व से ही पृथ्वी पर है। आलिव ऑयल जैतून से ही अंग्रेजी शब्द आयल की उत्पत्ति हुई है। आमतौर पर अरब देशों में उगने वाले पौधों की अधिकतर खेती स्पेन में होती है।
विटामिन ई से भरपूर जैतून का तेल दुनिया भर में खाने और दवाइयों के लिए प्रयोग होता है। पेड़ कटिंग लगाकर उगाया जा सकता है। मालूम हो कि 1980 के दशक में इंडो इटालियन प्रोजेक्ट के तहत ज्योलीकोट में जैतून उगने का प्रयास किया गया था जो सफल नहीं हो पाया था। वहीं भीमताल में अब इस पेड़ ने अपनी उपस्थिति दर्ज कराई है। भीमताल में बड़े पैमाने पर औद्योगिक घाटी में कई संस्थान खाली पड़े हैं। ऐसे में यदि वहां के युवक जैतून के वृक्षों को लगाकर उसका तेल निकालने का कार्य प्रारंभ करें तो भारत में जैतून तेल की अधिकांश मांग को पूरा किया जा सकता है।
भीमताल में जैतून पेड़ का उगना आश्चर्य सा लगता है अब तक कहीं भी पेड़ होने और उसे पर फल लगने की सूचना रिकॉर्ड नहीं की गई है। दुनिया भर के लोग इसका तेल खाने के लिए प्रयोग करते हैं। भीमताल में अब इस पेड़ के पौधे को तैयार किया जा रहा है।
-डॉ अखिलेश त्यागी, निदेशक, फ्लोरीवेल नर्सरी
