महिला अस्पताल: दूसरी छमाही में भी 91 नवजात शिशुओं की मौत
अंकित चौहान, बरेली, अमृत विचार। साल 2023 की पहली छमाही में जिला महिला अस्पताल में जहां 140 नवजात शिशुओं की जान गई, वहीं दूसरी छमाही में भी यह आंकड़ा कुछ कम जरूर हुआ लेकिन फिर भी 91 मौतों तक पहुंच गया।
हालांकि महिला अस्पताल के अधिकारी नवजात शिशुओं की इन मौतों की वजह बर्थ एसफिक्सिया को बता रहे हैं। उनका कहना है कि गर्भावस्था के दौरान उचित देखभाल न होने की वजह से यह बीमारी होती है जो नवजात शिशु की मौत का कारण बन जाती है।
महिला अस्पताल में नवजात शिशुओं की मौतों का यह आंकड़ा इसलिए गंभीर है क्योंकि यहां हर महीने औसतन 40 से 50 प्रसव होते हैं और नवजात शिशुओं की मौत का आंकड़ा इसका एक तिहाई है। यानी करीब 15 नवजात शिशुओं की हर महीने मौत हो जाती है। जनवरी से जून तक महिला अस्पताल में 140 नवजात शिशुओं की मौत हुई थी और जुलाई से दिसंबर तक 91 बच्चों को नहीं बचाया जा सका। इन बच्चों को प्रसव के बाद महिला अस्पताल के ही एसएनसीयू में भर्ती कराया गया था। अधिकारियों के अनुसार महिला अस्पताल में होने वाले प्रसव के बाद पांच से आठ प्रतिशत तक बच्चे बर्थ एसफिक्सिया से ग्रसित होते हैं।
जन्म लेने के बाद शिशु रोए न तो बर्थ एसफिक्सिया
वरिष्ठ प्रसूति रोग विशेषज्ञ डॉ. मृदुला शर्मा के अनुसार जन्म लेने के तुरंत बाद शिशु अगर नहीं रोते हैं तो उन्हें रुलाने के लिए उल्टा करके शरीर के निचले हिस्सों और नितंब पर हल्के हाथों से उन्हें थपथपाया जाता है। अगर इसके बाद भी बच्चा नहीं रोता तो उस स्थिति को बर्थ एसफिक्सिया कहा जाता है। बच्चे के मस्तिष्क तक ऑक्सीजन न पहुंचने की वजह से यह स्थिति पैदा होती है। इससे नवजात शिशु की जान चली जाती है।
देहात के स्वास्थ्य केंद्रों से रेफर हुए शिशुओं की मौत का ग्राफ ज्यादा
महिला अस्पताल अधिकारियों के अनुसार पिछले छह महीनों माह में जिला महिला अस्पताल में 156 ऐसे बच्चों का जन्म हुआ जो बर्थ एसफिक्सिया से ग्रसित थे, लेकिन 235 बच्चे ऐसे थे जो देहात के स्वास्थ्य केंद्रों से गंभीर हालत में रेफर किए गए थे। बर्थ एसफिक्सिया से ग्रसित जिन 91 बच्चों की मौत हुई, उनमें जिला महिला अस्पताल में जन्मे 17 ही शिशु थे, 74 देहात के स्वास्थ्य केंद्रों से रेफर होकर आए थे।
गर्भवती महिलाओं रखना चाहिए ख्याल
- सात से नौ महीने के बीच गर्भ में हर रोज 10 बार बच्चे की हलचल महसूस होनी चाहिए।
- अगर 24 घंटे तक गर्भस्थ शिशु की हलचल महसूस न हो तो फौरन डॉक्टर की सलाह लें।
- गर्भावस्था के दौरान हर महिला को कम से कम चार बार डॉक्टर का परामर्श लेना चाहिए।
- गर्भावस्था के दौरान कम से कम दो बार खून, ब्लड प्रेशर, यूरिन समेत जरूरी जांचें कराएं।
- पौष्टिक खानपान और डॉक्टर की सलाह के मुताबिक व्यायाम भी जरूर करना चाहिए।
बर्थ एसफिक्सिया के कारण जान गंवाने वाले शिशुओं में रेफर होकर आने वाले शिशुओं की संख्या ज्यादा है। यहां भर्ती होने वाले सभी शिशुओं को बेहतर इलाज देने की कोशिश की जा रही है। - डॉ. त्रिभुवन प्रसाद, सीएमएस, जिला महिला अस्पताल।
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