प्रयागराज: जिला कानूनी सेवा प्राधिकरण तय करेगा मुआवजा देने के लिए दुष्कर्म पीड़िता की पात्रता
प्रयागराज। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक दुष्कर्म पीड़िता द्वारा मुआवजे का दावा करने की प्रक्रिया को स्पष्ट करते हुए कहा कि मुआवजा देने और उसकी मात्रा के लिए पीड़िता की पात्रता केवल जिला कानूनी सेवा प्राधिकरण (डीएलएसए) ही तय कर सकता है। संबंधित अदालत केवल इसकी सिफारिश ही कर सकती है।
पीड़िता द्वारा मुआवजे का दावा उत्तर प्रदेश पीड़ित मुआवजा योजना, 2014 के मापदंडों के अंतर्गत आता है या नहीं, इसका निर्धारण उक्त प्राधिकरण ही करता है। ऐसी परिस्थितियों में न्यायालय की भूमिका औपचारिक ही रहती है। उक्त आदेश न्यायमूर्ति ज्योत्सना शर्मा की एकलपीठ ने यूपी पीड़ित मुआवजा योजना के तहत मुआवजे की मांग करने वाली दुष्कर्म पीड़िता की याचिका को निस्तारित करते हुए पारित किया।
कोर्ट ने कहा कि भारतीय दंड प्रक्रिया संहिता में 31 दिसंबर 2009 को शुरू की गई धारा 357-ए के अनुसार राज्य सरकार केंद्र सरकार के सहयोग से पीड़ित या उसके आश्रितों को मुआवजा देने के उद्देश्य से धन उपलब्ध कराने के लिए योजना तैयार करने का अधिकार देती है। उत्तर प्रदेश पीड़ित मुआवजा योजना, 2014 उक्त धारा के तहत ही जानी जाती है।
योजना के तहत स्थापित पीड़ित मुआवजा कोष का संचालन सचिव, राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण द्वारा किया जाता है। योजना के साथ संलग्न अनुसूची-एक में दुष्कर्म पीड़िता को दिए जाने वाले मुआवजे की अधिकतम सीमा का प्रावधान है। इसी योजना में प्रावधान है कि मुआवजा देने की सिफारिश अदालत द्वारा की जा सकती है।
यह सिफारिश पीड़ित द्वारा दिए गए आवेदन पर या अदालत द्वारा स्वत: संज्ञान से की जा सकती है। जब ऐसी सिफारिश जिला विधिक सेवा प्राधिकरण को प्राप्त होती है तो वह मामले की जांच कर दावे की सामग्री को सत्यापित करता है और योजना के तहत अन्य औपचारिकताओं का पालन करने के बाद 2 महीने के भीतर मुआवजा दिए जाने की अनुशंसा करता है। मौजूदा मामले में ट्रायल कोर्ट ने आईपीसी की धारा 363 और 376 के तहत दुष्कर्म आरोपी को दोषी ठहराया और आजीवन कारावास तथा 25,000 रुपए के जुर्माने की सजा सुनाई।
मुआवजे के तौर पर पीड़िता को आधी रकम का भुगतान किया जाना सुनिश्चित किया, लेकिन अभियुक्त ने दोषसिद्धि आदेश के विरुद्ध अपील दाखिल कर दी, इसलिए कोई जुर्माना जमा नहीं किया गया। परिणामस्वरुप याची को कोई मुआवजा नहीं मिला। याची ने मुआवजे के लिए हाईकोर्ट में याचिका दाखिल की तो उसे निचली अदालत से संपर्क करने का निर्देश दिया गया।
इसके बाद याची के आवेदन पर संबंधित जिला प्रोबेशन अधिकारी ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि उत्तर प्रदेश रानी लक्ष्मीबाई महिला एवं बाल सम्मान कोष योजना, 2015 में लाई गई और वर्तमान मामला 2010 का है, इसलिए याची उक्त योजना के तहत किसी भी मुआवजे की हकदार नहीं है।
रिपोर्ट पर विचार करते हुए निचली अदालत, गौतमबुद्ध नगर ने याची का आवेदन खारिज कर दिया और याची ने इसी आदेश को वर्तमान याचिका में हाईकोर्ट के समक्ष चुनौती दी है। अंत में कोर्ट ने याची को निचली अदालत या जिला कानूनी सेवा प्राधिकरण के समक्ष आवेदन दाखिल करने की स्वतंत्रता दी और उस पर प्राधिकरण को कानून के अनुसार विचार करने का निर्देश दिया।
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