पीलीभीत: रामलला की अलख जगाने के लिए जत्थों को अयोध्या ले जाते थे सरयू, दो बार जेल भी गए

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रामजन्म भूमि आंदोलन के दौरान दो बार जेल भी गए शहर के सरयू प्रसाद रस्तोगी

फोटो- सरयू प्रसाद रस्तोगी।

सुनील यादव, पीलीभीत। युवा राम भक्त जिस तन्मयता के साथ नब्बे के दशक में श्री राम जन्मभूमि आंदोलन के दौरान उतरे थे, वहीं जोश और जुनून आज एक बार फिर से बूढ़ी हो चुकी कायाओं में हिलोरें मार रहा है। आखिर यह जोश हो भी क्यों न, क्योंकि 22 जनवरी को अयोध्या में उनके आराध्य की प्राण प्रतिष्ठा के साथ उनके जीवन का संकल्प जो पूरा हो रहा है।

श्री राम जन्मभूमि आंदोलन के दौरान तराई की तलहटी में बसे इस जिले के तमाम रामभक्तों ने अपने-अपने तरीके से लोगों के दिलों में राम नाम की अलख जगाने का काम किया। उस दौरान उन्हें अयोध्या की अंधेरी गलियों में भूखा-प्यासा भटकने के साथ कई बार जेल भी जाना पड़ा, लेकिन वह अपने कर्तव्य पथ स डिगे नहीं।

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अस्सी और नब्बे के दशक में श्रीराम जन्मभूमि आंदोलन की शुरूआत हो चुकी थी। वर्ष 1990 आते-आते इस आंदोलन की आंच जनपद में भी पहुंच चुकी थी। इस आंदोलन में जनपद के  कई ऐसे चेहरे रहे, जो उस दौरान लगातार सक्रिय भूमिका निभाकर राम नाम की अलख जगाने में जुटे रहे।

भले ही उन्हें तमाम दुश्वारियां झेलनी पड़ी, जेल जाना पड़ा, लेकिन वहीं किया जिसको उन्होंने ठान रखा था। इन्हीं रामभक्तों में एक चेहरा थे सरयू प्रसाद रस्तोगी। शहर के मोहल्ला आसफजान निवासी सरयू प्रसाद रस्तोगी उस दौरान विश्व हिंदू परिषद के संगठन मंत्री  हुआ करते थे।

बकौल सरयू प्रसाद रस्तोगी: राम जन्म भूमि आंदोलन को लेकर जिस तरह से रामभक्तों के साथ अन्याय हो रहा था, उससे दिल में कहीं न कहीं ठेस पहुंच रही थी। फिर मैंने जिले के रामभक्तों को अयोध्या ले जाकर उस स्थान को दिखाने का संकल्प लिया, जहां उस दौरान ढांचा हुआ करता था।

सरयू प्रसाद रस्तोगी ने बताया कि वर्ष 1992 में आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाने पर उन्हें पीलीभीत से गिरफ्तार कर बदायूं जेल भेजा गया। जहां उन्हें करीब 20 दिन जेल में रहना पड़ा। इसके बाद पीलीभीत शहर में जुलूस में शामिल होने पर छह दिन के लिए जेल में रहना पड़ा। बता दें कि सरयू प्रसाद रस्तोगी लोकतंत्र रक्षक सेनानी भी हैं।

ट्रेनों से रामभक्तों को ले जाते थे अयोध्या
वर्तमान में शहर की कांशीराम आवास कॉलोनी ईदगाह में रह रहे 83 वर्षीय सरयू प्रसाद रस्तोगी उन दिनों का मंजर याद करते हुए बताते हैं कि उन्होंने जिले के रामभक्तों को जत्थों में अयोध्या ले जाने का प्रण लिया। ट्रेन ही एक मात्र ऐसा जरिया था, जिसके माध्यम से बिना कोई खर्चा किए पहुंचा जा सकता था।

इसके लिए वह सहयोगियों के साथ घर-घर जाकर अयोध्या जाने का न्यौता देते थे। जब अयोध्या जाने के लिए 100 से 150 लोगों का जत्था तैयार हो जाता था, तो उसे बकायदा सूचीबद्ध करते थे, ताकि उनकी सुरक्षित घर वापसी भी करवा सके। ट्रेन के जरिए अयोध्या पहुंचकर जत्थे में शामिल रामभक्तों को उस स्थान पर लेकर जाते थे, जहां उस दौरान ढांचा था।

वहां पहुंचकर जत्थे में शामिल राम भक्तों को ढांचे को दिखाकर उन्हें उसके अतीत के बारे में बताते। मकसद एक ही था कि ज्यादा से ज्यादा लोग आंदोलन से जुड़ें। वर्ष 1992 में आंदोलन के चलते अयोध्या की बिजली सप्लाई भी ठप कर दी गई थी। शाम होने पर अयोध्या की अंधेरी गलियों में जैसे-तैसे जत्थे में शामिल महिलाओं, पुरुषों और बच्चों को कारसेवक पुरम में पहुंचाते थे और वहीं सब ठहरते थे।

बोले- राम नाम लेने पर मजिस्ट्रेट ने भी नहीं की गिरफ्तारी
सरयू प्रसाद रस्तोगी ने बताया कि एक बार वह 100 से अधिक राम भक्तों का जत्था लेकर ट्रेन से अयोध्या जा रहे थे। बीसलपुर रेलवे स्टेशन पर पहुंचने से पहले ही मजिस्ट्रेट चेकिंग के लिए ट्रेन को रोक दिया गया। चूंकि जत्थे में शामिल सभी राम भक्त बिना टिकट ही जाते थे, चेकिंग के दौरान टिकट न होने सभी राम भक्तों को ट्रेन से नीचे उतरने को कहा गया।

इससे जत्थे में शामिल महिलाएं और बच्चे बुरी तरह डर गए। ट्रेन के नीचे खड़े मजिस्ट्रेट ने सभी को गिरफ्तार कर बस में बिठाने का आदेश भी दिया। इस पर मैंने मजिस्ट्रेट को सभी के राम भक्त होने और अयोध्या जाने की जानकारी दी। राम का नाम सुनते ही मजिस्ट्रेट ने अपने तेवर ढीले करते हुए पूछा कि क्या महिलाओं के साथ उनके बच्चे भी है। बच्चों के साथ होने की जानकारी होने पर मजिस्ट्रेट ने तत्काल सभी की गिरफ्तारी का आर्डर वापस ले लिया।

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