मामले का पटाक्षेप
बाबरी विध्वंस मामले में बुधवार को सीबीआई की विशेष अदालत ने जब मामले के सभी आरोपियों को दोषमुक्त करार दिया तो 28 सालों से चले आ रहे एक विवादित मामले का पटाक्षेप भी हो गया। राम मंदिर मामले में सुनवाई के बाद अयोध्या प्रकरण का यह दूसरा मामला था, जिसका सभी को इंतजार था। किसी …
बाबरी विध्वंस मामले में बुधवार को सीबीआई की विशेष अदालत ने जब मामले के सभी आरोपियों को दोषमुक्त करार दिया तो 28 सालों से चले आ रहे एक विवादित मामले का पटाक्षेप भी हो गया। राम मंदिर मामले में सुनवाई के बाद अयोध्या प्रकरण का यह दूसरा मामला था, जिसका सभी को इंतजार था। किसी भी मुकदमे की सुनवाई को 28 वर्ष कम नहीं होते हैं। वह भी तब जब इस मामले के 17 आरोपियों की इस दौरान मृत्यु भी हो चुकी है। चूंकि यह मामला बेहद पेचीदा और गवाहों के बयान तमाम साक्ष्यों की मांग करता था लिहाजा मामले की सुनवाई में इतना वक्त लगना स्वाभाविक था। देर से ही मगर अब फैसला आया है तो यह उम्मीद की जानी चाहिए कि अब सौहार्दपूर्ण तरीके से यह पेचीदा मामला समाप्त हो जाएगा।
इस प्रकरण पर सीबीईआई की विशेष अदालत ने तमाम साक्ष्यों का गहन अध्ययन किया और कोर्ट का नतीजा यह रहा कि बाबरी विध्वंस एक पूर्व नियोजित साजिश नहीं बल्कि आकस्मिक घटना थी जिसे अराजक तत्वों द्वारा अंजाम दिया गया। अदालत ने आरोपियों का विध्वंस में संलिप्तता से इनकार किया। बहरहाल, अदालत के इस फैसले के बाद उम्मीद की जानी चाहिए कि अयोध्या मंदिर प्रकरण की तरह की इस मामले में भी हमारा देश सांप्रदायिक सौहार्द की एक मिसाल पेश करेगा। ऐसे कई मौके आए-गए, जब तमाम कारणों से सांप्रदायिक सौहार्द को झटका लगा मगर जिस तरह से अयोध्या मंदिर और मस्जिद निर्माण के सर्वोच्च अदालत के फैसले के बाद देश ने सांप्रदायिक सौहार्द की मिसाल पेश की उससे यह तो उम्मीद जरूर बंधती है कि हमारे देश का हर नागरिक यह समझता है कि देश से बड़ा कुछ नहीं है।
ऐसी स्थितियां बनती रहती हैं, मगर सौहार्द हमेशा बरकरार रहना चाहिए। अदालत के फैसले का सम्मान करना भी हर देशवासी का कर्तव्य है ताकि हमारी न्याय व्यवस्था से लोगों की आस्था किसी भी तरह से कम न हो। उधर, इस मामले में पड़ोसी देश पाकिस्तान की फिर से सामने आई खीझ ने भी साफ कर दिया है कि वह भारत में किसी भी तरह से सौहार्द नहीं चाहता है और उसकी कोशिश हमेशा से ही यहां एक संप्रदाय विशेष को भड़काने की रही है।
आज भी मामले में अदालत के निर्णय के बाद पाकिस्तान के विदेश मंत्री ने जिस तरह से हमारी न्यायिक व्यवस्था की आलोचना की उससे साफ था कि वह विशेष वर्ग को भड़काना चाहता है। मगर उन्हें नहीं मालूम कि हमारे देश की संस्कृति और यहां के सांप्रदायिक सौहार्द की मिसालें भी दी जाती रही हैं। फिर पाकिस्तान को यह ज्यादा समझना होगा कि वह कंगाल हो रहे अपने देश के नागरिकों की फिक्र पहले करे और ऐसे विषयों पर अपनी टिप्पणी बाद में। पाकिस्तान अगर हमें सीख देता है तो यह बात बहुत ही हास्यास्पद लगती है। बहरहाल, सीबीईआई की विशेष अदालत के इस निर्णय के बाद एक विवाद का भी हमेशा के लिए अंत हो गया और यह पटाक्षेप जरूरी था।
