मजदूरों के हक में
सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को गुजरात सरकार की उस अधिसूचना को रद कर दिया है जिसके तहत मजदूरों को ओवरटाइम मजदूरी का भुगतान किए बिना अतिरिक्त काम लेने की छूट थी। दरअसल गुजरात सरकार ने अप्रैल माह में अधिसूचना जारी की थी जिसमें उद्योगों को लाकडाउन की अवधि में फैक्ट्री अधिनियम के तहत श्रमिकों को …
सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को गुजरात सरकार की उस अधिसूचना को रद कर दिया है जिसके तहत मजदूरों को ओवरटाइम मजदूरी का भुगतान किए बिना अतिरिक्त काम लेने की छूट थी। दरअसल गुजरात सरकार ने अप्रैल माह में अधिसूचना जारी की थी जिसमें उद्योगों को लाकडाउन की अवधि में फैक्ट्री अधिनियम के तहत श्रमिकों को 12 घंटे की मजदूरी करनी थी मगर ओवरटाइम काम के बदले उन्हें सामान्य मजदूरी का ही भुगतान करने की व्यवस्था थी।
अधिसूचना में सार्वजनिक आपातकाल की स्थिति के दौरान फैक्ट्री अधिनियम के दायरे में कारखानों को छूट देने की अनुमति मिली थी। सर्वोच्च न्यायालय ने अपने फैसले में कहा कि महामारी को सार्वजनिक आपातकाल नहीं माना जा सकता है। अदालत ने मजदूरों को अप्रैल से जुलाई के दौरान किए गए ओवरटाइम मजदूरी का भुगतान करने का भी आदेश दिया है। सर्वोच्च अदालत के इस फैसले से बड़ी संख्या में मजदूरों को लाभ तो मिलेगा ही साथ ही यह फैसला स्वयं में एक नजीर भी होगा ताकि भविष्य में सार्वजनिक आपातकाल न होने की स्थिति में भी इस भारी भरकम शब्द और उस जैसी परिस्थितियों का हवाला देते हुए मजदूरों का ओवरटाइम के नाम पर शोषण न हो सके। यूं भी हमारे देश में निजी सेक्टर, उद्योगों में मजदूरों के हाल किसी से छिपे नहीं हैं।
तमाम फैक्ट्रियों में श्रम कानूनों के उल्लंघन को लेकर आए दिन मजदूर संगठनों के प्रदर्शन होते रहते हैं। मजदूर शोषण की बातें यहां आम हैं और मजदूरों को भविष्यनिधि समेत तमाम सुविधाओं से वंचित रखा जाना एक आम बात है। बहरहाल, भविष्य निधि का मामला तो बहुत संवेदनशील है, मगर इसके इतर अगर मजदूरों की तय मजदूरी में भी सार्वजनिक आपातकाल के नाम पर कटौती कर दी जाए तो इसे किसी भी लिहाज से सही नहीं ठहराया जा सकता है।
वैसे भी बेरोजगारों से भरे इस देश में श्रम शक्ति एक तरह से कंपनियों की बंधक जैसी ही होती है क्योंकि कंपनी मालिकों की शर्तों के खिलाफ अगर कोई मजदूर जाता है तो उसे नौकरी से हाथ धोना पड़ता है। नौकरी से हटने के बाद उसका गुजारा मुश्किल है, लिहाजा तमाम विपरीत परिस्थितियों में भी मजदूर काम करता है। अब सर्वोच्च न्यायालय के आदेश के बाद उम्मीद की जानी चाहिए कि न केवल जिन मजदूरों से ज्यादा काम लिया गया था उन्हें ओवरटाइम काम का भुगतान होगा बल्कि इस आदेश के दूरगामी असर मजदूर हित में आएंगे।
