Video : नर्स ने जिस विभाग में की सालों मरीजों की सेवा, वही दे रहा दर्द, जानें पूरा मामला
लखनऊ, अमृत विचार। कोरोना काल में सरकार ने आम आदमी को राहत देने में कोई कसर नहीं छोड़ी, लेकिन एक नर्स जिसे कोविड के दौरान फ्रंट लाइन वर्कर कहा जाता रहा। उसे कोई राहत मिलती नजर नहीं आ रही है। नर्स ने करीब 36 महीने बिना वेतन के काम किया। इतना ही नहीं जिस अस्पताल के सरकारी मकान में वह रह रहीं थी। वहां का प्रशासन उन पर तीन गुना अधिक किराया यानी की करीब 4 लाख 70 हजार रुपये जमा करने का दबाव बना रहा है। आरोप है कि इस दबाव से परेशान नर्स की तबीयत खराब हो गई और उन्हें अस्पताल में भर्ती होना पड़ा। दबाव उस अस्पताल और विभाग की तरफ से लगाया जा रहा है जहां नर्स ने करीब 16 साल सेवायें दी हैं।
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— amrit vichar (@amritvicharlko) January 29, 2024
दरअसल, पूरा मामला डॉ. राम मनोहर लोहिया अस्पताल व स्वास्थ्य विभाग से जुड़ा हुआ है। नर्स शशि सिंह की मानें तो वह कई साल से डॉ. राम मनोहर लोहिया अस्पताल में कार्यरत थीं, लेकिन अस्पताल का संस्थान में विलय होने के बाद साल 2020 में कोविड के दौरान उनके मूल विभाग यानी की स्वास्थ्य विभाग में वापस भेज दिया गया। आरोप है कि लोहिया संस्थान प्रशासन ने उन्हें उनके मूल विभाग में वापस तो भेज दिया, लेकिन उनकी एलपीसी नहीं दी। जिसके चलते उन्हें करीब 36 महीने तक वेतन नहीं मिला। इस दौरान उनकी तैनाती राजधानी के लोकबंधु अस्पताल में थी।
विना वेतन के दो साल तक बच्चों को पाला
नर्स शशि सिंह पर ही पूरे परिवार की जिम्मेदारी है । ऐसे में बिना वेतन के 36 महीने तक अपने दो बच्चों को पालना काफी कठिनाई भरा रहा। एलपीसी न मिलने की वजह से उन्हें दूसरा मकान भी नहीं मिला। जिसकी वजह से वह लोहिया संस्थान में स्थित सरकारी मकान में रहती रहीं। बाद में जब उन्हें एलपीसी मिली। तब उन्होंने मकान छोड़ा, नर्स से मकान के किराये के बदले 4 लाख 70 हजार रुपये जमा करने को कहा जा रहा है। शशि सिंह का आरोप है कि उनसे तीन गुना किराया वसूला जा रहा है, जबकि वह एक लाख से अधिक रूपये बतौर किराया जमा कर चुकी हैं। शशि सिंह ने इस मामलें में मुख्यमंत्री से मदद की गुहार भी लगाने की बात कही है। साथ ही यह भी कहा है स्वास्थ्य विभाग की तरफ से उन्हें कोई राहत नहीं मिली है। बल्कि उनको परेशान किया जा रहा है। यही वजह है कि उनका स्वास्थ्य खराब हुआ।
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