प्रयागराज: चाहने वालों की संख्या कम हुई तो लुप्तप्राय होने के कगार पर पहुंचीं लोकगीतों की पारंपरिक विधाएं
कमाई नहीं होने से गीतों से दूर हो रही युवा पीढ़ी, कलाकार बोले- बस सरकार से है उम्मीद
एक जमाना था जब हर मौकों पर गाए जाते थे लोकगीत
राजीव कुमार, नैनी, प्रयागराज। देश की तमाम पारंपरिक लोक गीतों की विधाएं लुप्त होने के कगार पर हैं। एक जमाना था जब हर मौके पर लोक गीत गाए जाते थे। भारतीय परंपरा की कजली, बेलवरिया, फाल्गुनी, सोहर, पंवारा, चनैनी, खड़ा बिरहा, चैता, दादरा, कहरवा आदि लोक गीतों की गूंज समय के साथ आज आधुनिक और चकाचौंध भरी दुनिया में समाप्त होती जा रही है।
इसके पीछे मूल कारण है कि लोक गीतों को चाहने वालों की संख्या काफी कम हो गई है, जिससे कलाकारों को महंगाई को देखते हुए पारिश्रमिक नही मिल पाता। आज अधिकांश युवा कम समय में अधिक रुपए कमाना चाहते हैं और लोक गीतों के गायन में यह संभव बहुत कम हो पाता है। हालांकि लोककलाकार संघ यमुनापार के अध्यक्ष श्याम लाल बेगाना ने कहा कि आज की युवा पीढ़ी भी हमसे जुड रहे हैं। पुरानी विधाओं को जिंदा रखने के लिए प्रयास भी कर रहे हैं। पुस्तक भी लिखा है। प्रयास है कि समाज में फूहड़पन ना जाए।
रामबाबू यादव ने कहा कि इसमें आमदनी कम होती जा रही है इससे लोग हटते का रहे हैं। लेकिन हम कलाकारों को प्रोत्साहित कर रहे हैं। अब लोग ध्यान दे रहे हैं। राजरूप यादव ने कहा कि माटी के गीत, बुजुर्गों की परंपरा को आने वाली पीढ़ी इसको आगे बढ़ाए। लोक कला के माध्यम से लोगों को संदेश दिए जाते थे। इसको जीवंत रखना चाहिए।
लोक कलाकार नेब्बू लाल का कहना है कि सरकार इस ओर ध्यान नहीं दे रही है। कजली, बेलवरिया, फाल्गुनी, सोहर आदि परंपरागत गीत लुप्त हो रहे हैं। आय नही है जिससे लोग छोड़ रहे हैं। हम लोग लोक कला को बचाने का प्रयास कर रहे हैं। जनक जी निर्मल का भी कहना है सरकार इस ओर ध्यान देना चाहिए, क्योंकि परंपरा समाप्त हो रही है।इसके लिए हम प्रयासरत हैं सरकार भी प्रयास करे।
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