बदलना होगा नजरिया

Amrit Vichar Network
Edited By Amrit Vichar
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हाथरस की घटना ने एक बार फिर निर्भया कांड की याद दिला दी। पूरे देश में जिस तरह निर्भया को इंसाफ दिलाने की मांग को लेकर लोगों में उबाल था उसी प्रकार हाथरस और बलरामपुर की बेटी को भी इंसाफ दिलाने की मांग उठ रही है। निश्चित ही, कानून की पकड़ में आने वाले दरिदों …

हाथरस की घटना ने एक बार फिर निर्भया कांड की याद दिला दी। पूरे देश में जिस तरह निर्भया को इंसाफ दिलाने की मांग को लेकर लोगों में उबाल था उसी प्रकार हाथरस और बलरामपुर की बेटी को भी इंसाफ दिलाने की मांग उठ रही है। निश्चित ही, कानून की पकड़ में आने वाले दरिदों को सजा तो मिलेगी ही, लेकिन ऐसी घटनाओं को हमें केवल यहीं तक सीमित नहीं रखना चाहिए कि दोषियों को कड़ी सजा मिले। वह मिलनी ही चाहिए और मिलेगी भी, लेकिन अब हमें इस दिशा की तरफ भी गंभीरता से सोचने की जरूरत है कि आखिर समाज किस दिशा की तरफ बढ़ रहा है।

क्यों आज तक भी समाज महिलाओं के प्रति अपना नजरिया नहीं बदल पाया है? निर्भया कांड के बाद देश में फास्ट ट्रैक कोर्ट की मांग उठी थी। ऐसी व्यवस्था कर भी दी गई, उसके बाद भी रेप की घटनाओं में कोई कमी नहीं आई। ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर ऐसा क्या उपाय किया जाए कि रेप जैसी वीभत्स घटनाओं को कम किया जाए। दूसरा सवाल, दलित महिलाओं के साथ होने वाली ऐसी घटनाएं हैं। तकनीकी परिवेश में रहने के बाद हमने हर चीज को बदल तो लिया, अपनी सोच को भी, लेकिन नहीं बदला तो महिलाओं के प्रति अपना नजरिया। इसे हर हाल में बदलना होगा।

दलितों के प्रति सोच बदलने का भी सवाल है। यह सच है कि दलित महिलाओं के साथ बलात्कार की घटनाएं बढ़ी हैं। नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के आंकड़े भी इसकी तस्दीक करते हैं। साल 2018 में देशभर में 2957 दलित महिलाओं का बलात्कार हुआ। इनमें 871 पीड़ित वारदात के वक्त नाबालिग थीं। यूपी में सबसे अधिक 526 महिलाएं बलात्कार का शिकार हुईं। वहीं मध्यप्रदेश में 474, राजस्थान में 385, महाराष्ट्र में 313 और हरियाणा में 171 दलित महिलाओं को बलात्कार का दंश झेलना पड़ा।

2016 में दलित हिंसा के 40 हजार 743 मामले दर्ज हुए थे जो 2018 में बढ़कर 42 हजार 748 हो गए। इससे पता चलता है कि देश में दलितों के शोषण की घटनाएं कम नहीं हो रही हैं, जो चिंताजनक है। इस पूरे परिदृश्य में पुलिस-प्रशासन के रवैये पर बात करना जरूरी है। हाथरस की घटना में जो अमानवीय व्यवहार पुलिस ने किया उसे किसी भी कसौटी पर स्वीकार नहीं किया जा सकता है। लिहाजा, रेप के दोषियों के साथ-साथ ऐसे अधिकारियों के खिलाफ भी सख्त कार्रवाई होनी चाहिए। बशर्ते, यह तत्कालिक समस्या का समाधान है, लेकिन सबसे बड़ा सवाल नजरिए में बदलाव का है। हमें न केवल महिलाओं व दलितों के प्रति अपना नजरिया बदलना होगा बल्कि पुलिस-प्रशासन को भी संवेदनशील होना पड़ेगा तभी हम बेहतर व सुरक्षित सामाजिक परिवेश की नींव रख पाएंगे।