हल्द्वानी: जूट बारदाना सिलने वालों का रोजगार संकट में
कभी इस काम से 250-300 लोग जुड़े थे लेकिन अब 10-12 लोग ही बचे हैं
ललित पांडे, हल्द्वानी, अमृत विचार। शहर की नवीन मंडी में कटे-फटे जूट बारदाना सिलने वालों की संख्या कभी सैकड़ों थी लेकिन प्लास्टिक बारदाना की मांग बढ़ने से इनकी संख्या कम होती गई व अब गिने-चुने लोग ही इस रोजगार में बचे हुए हैं।
नवीन मंडी में पिछले 35 साल से कटे-फटे जूट के बारदाना सिलने वाले बिहार निवासी हरी कृष्णा बड़े गर्व के साथ बताते हैं कि उन्होंने कोलकाता में काम सीखा था व वहां काम सीखने वाला कहीं मात नहीं खाता। जिस बोरे को वह सिल रहे थे, उसे दिखाते हुए कहते हैं कि काम में बड़ी सफाई चाहिए, सिलाई बिल्कुल सिकुड़नी नहीं चाहिए।
फिर कुछ देर सोचने के बाद वह कहते हैं कि अब काम बहुत कम हो गया है। वह बताते हैं कि कभी हल्द्वानी मंडी में कटे-फटे जूट के बारदाना सिलने वाले 250-300 लोग थे। वर्ष 2000 तक उनकी यूनियन भी हुआ करती थी लेकिन प्लास्टिक बारदाने के बढ़ते चलन से इस धंधे में अब केवल 10-12 लोग ही रह गए हैं।
वह बताते हैं कि पहले आटा, चावल, दाल, गेंहू आदि सामान ले जाने के लिए जूट की बोरियों का इस्तेमाल होता था लेकिन धीरे-धीरे इसकी जगह प्लास्टिक की बोरियों ने ले ली, जिसका सीधा असर उनके रोजगार पर पड़ा। उन्होंने कहा कि जूट के मुकाबले प्लास्टिक की बोरियां सस्ती होने से लोग इसे प्राथमिकता देने लगे। उनके साथ काम कर रहे संजय कहते हैं कि जूट की बोरियों का इस्तेमाल अब किसान आदि करते हैं।
वह बताते हैं कि प्लास्टिक की बोरियां एक ही बार, जबकि जूट की बोरी पांच-छह बार प्रयोग में लाई जा सकती है व मरम्मत करके इसका फिर उपयोग किया जा सकता है। उन्होंने बताया कि वह ध्याड़ी के हिसाब से काम करते हैं व सुबह 8 से शाम 7 बजे तक 100-125 बारदाना सिलते हैं।
मालिक भी अपने बच्चों को इस धंधे में नहीं लाए
कभी मंडी में जूट बारदाना का धंधा करने वाले लोगों की संख्या सौ से ज्यादा थी लेकिन अब इनकी संख्या भी घटकर दो-तीन रह गई। हरी कृष्णा बताते हैं कि कामधंधे पर असर पड़ने पर मालिकों ने भी अपने बच्चों को इसकी बजाए दूसरा काम करने की नसीहत दी।
