Kanpur: बेहमई कांड: फैसला तो आया, पर नफरत नहीं गई... 43 साल में बहुत कुछ बदला लेकिन नरसंहार की याद आज भी है ताजा...
कानपुर, शैलेश अवस्थी। अब से 43 साल पहले कानपुर देहात के बेहमई गांव में डकैत फूलन देवी और उसके गैंग ने जो नरसंहार किया था, उसका फैसला तो आ गया लेकिन दो गावों के बीच नफरत की दीवार नहीं गिर सकी है। आज भी बेहमई गांव के लोग न तो गुढ़ा का पुरवा (फूलन का गांव ) जाते हैं और न ही वहां के लोग बेहमई की तरफ झांकने की हिम्मत जुटा पाते हैं।
बेहमई गांव से गुढ़ा का पुरवा के बीच कोई चार किलोमीटर की दूरी है लेकिन दिलों की दूरी ऐसी की कोई आज तक न पाट सका। मुलायम सिंह यादव ने जब फूलन को सांसद बनाया, तब कहा था कि वह बेहमई को सैफई बना देंगे। फूलन भी बेहमई जाकर माफ़ी मांगना चाहती थीं पर उन्हें वहां घुसने नहीं दिया गया था।
इतनी नफरत थी फूलन से
बेहमई से गांव वालों का कहना है कि फूलन से गुनहगार को मारा होता तो कोई बात नहीं लेकिन उसने बेहगुनाहों का खून बहाया। उनकी विधवाएं अभी भी खून के आंसू रो रहीं हैंl कैसे माफ़ कर दें। बेहमई ठाकुरों तो गुढ़ा का पुरवा (कालपी ) मल्लाहों का गांव है। कहते हैं अपने ऊपर अत्याचारों से परेशान होकर फूलन ने बंदूक उठाई थी। उसे जानकारी हुई कि उसके दुश्मन डकैत लालाराम-श्रीराम को बेहमई में शरण मिलती है और इसी कारण उसने 14 फरवरी 1981 को उस गांव में धावा बोला था।
पूरे गांव को घेरकर सभी 25 पुरुषों को कुएँ के पास एकत्र किया और फिर मैदान में उन्हें लाइन में खड़ा कर उन पर गोलियों की बौछार कर दी थीl इसमें 20 की मौत हो गई थी। उस समय वीपी सिंह उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री थे। इस नरसंहार से सरकार हिल गई थी। इसके बाद कई डकैत मारे गए और फूलन ने आत्मसमर्पण कर दिया था। बाद में मुलायन सिंह यादव ने फूलन को मिर्जापुर से सपा का टिकट देकर सांसद बना दिया था। इसके बाद तो बेहमई ने हमेशा सपा का बहिष्कार किया।
इस नरसंहार के बाद बेहमई और गुढ़ा का पुरवा के बीच नफरत की ऐसी खाई बनी जो अभी तक नहीं पट सकी है। फूलन के गांव वाले अभी भी बेहमई जाने से घबराते हैं। फूलन की हत्या से पहले तक तो अगर कोई फूलन के गांव वाला बेहमई में दिख गया तो उसकी शामत आ जाती थी। कई बार घर कर पीटा भी गया। एक -दूसरे के गांव में शादियां भी नहीं करते। एक दूसरे के गांव के बारे में बोलने से भी कतराते हैं लेकिन नफरत आँखों में साफ झलकती है।
