अद्भुत है भगवान श्री राम के गुरुधाम का शिवालय,जमीन के अंदर से निकला था शिवलिंग

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पृथ्वी पर उपलब्ध 52 अनोखे एवं दुर्लभ शिवलिंगों में से एक है महादेवा 

सतीश श्रीवास्तव /बाराबंकी, अमृत विचार। बाराबंकी के सप्त ऋषि आश्रम को भगवान श्री राम का गुरुधाम कहा जाता है। जहां से लगभग 40 किलोमीटर की दूरी पर वह शिवालय स्थित है जो पृथ्वी पर उपलब्ध 52 अनोखे एवं दुर्लभ शिवलिंगों में से एक है। जिसे महादेवा के नाम से जाना जाता है। ऐसा माना जाता है कि, महाभारत काल से पूर्व, भगवान शिव को एक बार फिर से पृथ्वी पर प्रकट होने की इच्छा हुई। सूरतगंज ब्लॉक के लोधौरा निवासी पंडित लोधेराम अवस्थी एक विद्वान ब्राह्मण, सरल, दयालु और अच्छा स्वभाव वाले किसान थे । 

मान्यता है कि एक रात भगवान शिव ने स्वप्न में उन्हें दर्शन दिये। अगले दिन, लोधेराम, जो पुत्रविहीन थे, अपने खेत में सिंचाई करने गए तो उन्होंने एक गड्ढा देखा जहां से सिंचाई का पानी जमीन में जाकर गायब हो रहा था। उन्होंने उस गड्ढे को पाटने के लिए कड़ी मेहनत की, लेकिन असफल घर लौटे। रात में, उसने फिर से उसी प्रतिमा को अपने सपनों में देखा, और मूर्ति को फुसफुसाते हुए यह कहते हुये सुना ‘उस गड्ढे में जहां पानी जाकर गायब हो रहा है वह मेरा स्थान है,  वहां मुझे स्थापित करो, इससे मुझे तुम्हारे नाम से प्रसिद्धि मिलेगी’। ऐसा कहा जाता है कि, अगले दिन  लोधेराम उस गड्ढे की खुदाई करने, तो उसका उपकरण किसी कठोर पदार्थ से टकराया और उसने अपने सामने वही मूर्ति देखी और उसमें रक्त स्राव हो रहा था, जहां उनका उपकरण मूर्ति पर पड़ा था, यह निशान आज भी देखा जा सकता है। इस दृश्य से लोधेराम भयभीत हुए, परन्तु मूर्ति के लिये खुदाई जारी रखी, पर मूर्ति के दूसरे छोर तक पहुंचने में असफल रहा। उसने उसे जस का तस छोड़ दिया, और उसी स्थान पर मंदिर का निर्माण किया, जिसे अर्ध-नाम ‘लोधे’ और भगवान शिव के ‘ईश्वर’ का नाम दिया, और इस प्रकार भक्त के नाम अर्थात लोधेश्वर से प्रसिद्ध हो गया। 

इसके बाद पुत्र विहीन लोधे राम अवस्थी को चार बेटों का आशीर्वाद मिला, महादेवा, लोधौरा, गोबरहा और राजनापुर के नाम दिये गये, इन नामों वाले गांव आज भी विद्यमान हैं। महाभारत में भी इस बात का उल्लेख मिलता है कि महाभारत के बाद पांडव ने इस स्थान पर महायज्ञ का आयोजन किया था, एक कुंआ आज भी पांडव-कूप के नाम से यहां का अस्तित्व में है।  इस कुंए के पानी में आध्यात्मिक गुण हैं, और जो कोई इस पानी को पीता है उसकी कई बीमारियों ठीक हो जाती हैं। महादेवा से चंद किलोमीटर की दूरी पर महारानी कुंती द्वारा स्थापित कुंतेश्वर महादेव मंदिर है। जो इस शिवलिंग के महाभारत कालीन होने की पुष्टि करता है। 

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जिस दिन लोधेराम अवस्थी ने इस शिवलिंग की स्थापना की थी। वह अगहन का महीना था। जिसके परिप्रेक्ष्य में आज भी प्राकट्योसव (अगहनी मेला) आयोजित किया जाता है। फाल्गुन मास में श्रद्धालु महाशिवरात्रि से 15 दिन पहले से ही बिठूर से गंगाजल लेकर महादेवा पहुंचकर लोधेश्वर का जिला अभिषेक करते हैं।दुनिया भर में मेलों और जनमानस के एकत्रित होने वाले समूहों के इतिहास में, महादेवा में महाशिवरात्रि के अवसर पर आयोजित मेला अद्वितीय है। पहले सरयू नदी महादेवा से सटकर बहती थीं। तटबंध निर्माण से पहले भी जब बाढ़ आती थी तो मां सरयू की धारा लोधेश्वर महादेव का अभिषेक कर वापस लौट जाती थी। आज भी सरयू की धारा इस स्थान को अयोध्या से जोड़ती है।
 
काशी की तर्ज पर कॉरिडोर बनाने की योजना
काशी विश्वनाथ मंदिर के तर्ज पर ही लोधेश्वर महादेवा का कॉरिडोर बनाने की योजना है। जिसके लिए 4 एकड़ जमीन पर्यटन विभाग को हस्तांतरित की जा चुकी है। पूरे कॉरिडोर के लिए 11 एकड़ जमीन चिन्हित की गई है। शासन ने एक करोड़ की टोकन मनी भी अवमुक्त कर दी है। हालांकि सिर्फ मुआवजा देने के लिए पचास करोड़ की जरूरत है।

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