सर्वोच्च फैसला

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Edited By Amrit Vichar
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दिल्ली के शाहीनबाग इलाके में नागरिकता संशोधन कानून को लेकर तीन महीने तक चले धरना-प्रदर्शन के खिलाफ दायर याचिका पर बुधवार को सुप्रीम कोर्ट ने जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ सख्त टिप्पणी कर सार्वजनिक स्थलों पर धरना-प्रदर्शन के मामलों में नजीर प्रस्तुत कर दी है। फैसला सुनाते हुए जब कोर्ट ने कहा कि सार्वजनिक स्थलों पर …

दिल्ली के शाहीनबाग इलाके में नागरिकता संशोधन कानून को लेकर तीन महीने तक चले धरना-प्रदर्शन के खिलाफ दायर याचिका पर बुधवार को सुप्रीम कोर्ट ने जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ सख्त टिप्पणी कर सार्वजनिक स्थलों पर धरना-प्रदर्शन के मामलों में नजीर प्रस्तुत कर दी है।

फैसला सुनाते हुए जब कोर्ट ने कहा कि सार्वजनिक स्थलों पर कब्जा हटाने के लिए अधिकारी अदालतों के पीछे नहीं छिप सकते हैं तो इसका मतलब साफ था कि तीन महीने तक एक सार्वजनिक स्थल पर कब्जा करने वाले आंदोलनकारियों को वहां से शांतिपूर्वक हटाया जाना चाहिए था। ऐसे प्रदर्शनों को हटाने के लिए न तो लंबे वक्त तक वार्ता का बहाना बनाया जा सकता है और न ही कोर्ट के आदेश की प्रतीक्षा। कोर्ट का कहना था कि सार्वजनिक स्थानों पर अनिश्चितकाल के लिए धरना-प्रदर्शन नहीं किया जा सकता है।

कोर्ट की यह टिप्पणी देश के उन हिस्सों के लिए भी अब नजीर बनेगी जहां प्रदर्शनकारी अपनी मांगें मनवाने के लिए सार्वजनिक स्थलों पर ही कब्जा कर लेते हैं। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में बहुत ही नपी-तुली बात कही है। यह सही है कि विरोध करने का अधिकार संविधान के तहत एक आधिकारिक गारंटी है, मगर इसके मायने यह तो नहीं हैं कि अपनी मांगों के लिए प्रदर्शनकारी दिल्ली-नोएडा में महत्वपूर्ण सड़क पर तीन महीने तक कब्जा जमाकर बैठे रहें और पुलिस मूक बनी रहे।

विरोध प्रदर्शन का दायरा हमेशा ही लोकतांत्रिक होना चाहिए और कोशिश यह होनी चाहिए कि इससे आम आदमी को कोई दिक्कत नहीं हो, मगर दिल्ली शाहीनबाग मामले में ऐसा बिलकुल भी नहीं था, इसीलिए सुप्रीम कोर्ट को कहना पड़ा कि विरोध प्रदर्शन संबंधित अधिकारियों से उचित अनुमोदन के बाद निर्दिष्ट क्षेत्र में ही होनी चाहिए। दिल्ली पुलिस को शाहीनबाग से लोगों के लिए कार्रवाई करनी चाहिए थी।

महत्वपूर्ण बात यह है कि कोर्ट ने साफ कर दिया है कि ऐसे मामलों में वार्ता के नाम पर भी लंबा समय नहीं लिया जा सकता है। दिल्ली पुलिस को सुप्रीम कोर्ट की कड़ी फटकार के बाद अब यह तो तय है कि सार्वजनिक स्थानों पर प्रदर्शन के नाम पर महीनों तक नहीं बैठा जा सकेगा। धरना-प्रदर्शन के नाम पर सार्वजनिक स्थानों पर अराजकता ही नजर आती है। इस अराजकता का अगर कोई शिकार होता है तो वह आम नागरिक ही है।

शाहीनबाग मामले में ही तीन महीने तक राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में दिल्ली के साथ ही अन्य शहरों को जोड़ने वाली महत्वपूर्ण सड़क प्रदर्शनकारियों के कब्जे में रही और आम जनता को कई किलोमीटर का लंबा सफर तय कर गंतव्य तक जाना पड़ा। उम्मीद है सुप्रीम कोर्ट के आज के इस फैसले से लोगों को जरूर राहत मिलेगी।