लखनऊ: 'मरीज भर्ती तो करा लोगे, इलाज बहुत मुश्किल है', बलरामपुर अस्पताल में गंभीर मरीजों को भी नहीं मिलता इलाज!
बलरामपुर अस्पताल के वार्ड में डॉक्टरों के इंतजार में पड़े रहते हैं मरीज, नहीं मिलता समय पर इलाज
वार्ड में भर्ती मरीजों के तीमारदारों ने लगाया गंभीर आरोप
लखनऊ, अमृत विचार। सरकार के आदेश हैं कि अस्पतालों से बिना इलाज के कोई मरीज न लौटाया जाए। सभी को समुचित इलाज प्राथमिकता पर मिले। इस आदेश का पालन मरीज को भर्ती करने तक सीमित है, इलाज के लिए तीमारदारों को जद्दोजहद करनी पड़ रही है। बलरामपुर अस्पताल इसका जीता-जागता उदाहरण है। यहां वार्डों में भर्ती मरीजों मरीजों को डॉक्टर एक सप्ताह तक देखने नहीं आते हैं। नर्सों और वार्ड ब्वॉय के सहारे इलाज चल रहा है। सबसे ज्यादा लापरवाही चेस्ट वार्ड में है।
शनिवार को वार्डों में भर्ती कई मरीजों के तीमारदारों ने डॉक्टर के न आने को आरोप लगाया। 756 बेड की क्षमता वाले बलरामपुर अस्पताल में 24 घंटे इमरजेंसी सुविधा संचालित है। ओपीडी में रोजाना पांच हजार से अधिक मरीज आते हैं। चेस्ट वार्ड में भर्ती मरीज भोला के तीमारदार ने बताया कि पांच दिन पहले भर्ती कराया था। तीन दिन से कोई सीनियर डॉक्टर देखने नहीं आया। इलाज के नाम पर कुछ नहीं किया जा रहा है। आर्थिक तंगी के कारण मरीज को निजी अस्पताल भी नहीं जा पा रहे।
इसी तरह एसएसबी वार्ड 203 में भर्ती मलिहाबाद निवासी वारिश, कैसरबाग के दीप और वार्ड 202 में भर्ती राजाजीपुरम निवासी सागर ने भी डॉक्टर के न आने का आरोप लगाया। अन्य मरीजों के परिजन भी इलाज से असंतुष्ट दिखे।
उखड़ रहीं थी सांसे, फिर भी नहीं मिला इलाज
मड़ियांव निवासी रोहित गुप्ता ने बताया कि मां उमा देवी को सांस लेने में तकलीफ थी। उन्हें तीन मार्च को केजीएमयू के ट्रॉमा सेंटर ले जाया गया था। वहां बेड खाली न होने का हवाला दिया गया। साथ ही यह भी बताया गया कि ट्रायज एरिया में ऑक्सीजन सिलेंडर नहीं है। लिहाजा मरीज को बलरामपुर अस्पताल रेफर कर दिया गया।
बलरामपुर अस्पताल की इमरजेंसी में करीब एक घंटे तक भर्ती रखा गया, लेकिन कोई इलाज नहीं मिला। काफी मिन्नतों के बाद एसएसबी वार्ड में शिफ्ट कर दिया गया। वार्ड में भी 24 घंटे से अधिक समय गया लेकिन कोई डॉक्टर देखने नहीं आया और न ही इलाज शुरू हुआ। काफी सिफारिश के बाद चार मार्च को देर शाम डॉक्टर आए और आईसीयू में भर्ती कराने की जरूरत बताई। रात करीब 9 बजे आईसीयू में बेड मिला। इलाज देर से शुरू होने के कारण मरीज को बचाया नहीं जा सका। रात करीब तीन बजे मरीज की मौत हो गई।
बिचौलियों के हो रहे शिकार
सरकारी अस्पतालों में इलाज न मिलने से परेशान तीमारदार मजबूर होकर बिचौलियों के चंगुल में फंसकर निजी अस्पताल पहुंच जाते हैं। वहां उनका जमकर आर्थिक शोषण किया जाता है। पूर्व में ऐसे कई शिकायतें आ चुकी हैं। हाल ही में बलरामपुर अस्पताल से ही निजी अस्पताल में मरीज को शिफ्ट कराने का मामला सामने आया था।
किसी को इलाज नहीं मिल रहा है। ऐसी किसी ने शिकायत नहीं की है। मामले की जांच कराई जाएगी। यदि डॉक्टर लापरवाही कर रहे हैं तो कार्रवाई सुनिश्चित की जाएगी।
डॉ. पवन कुमार, निदेशक, बलरामपुर अस्पताल
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