लंबी चुनावी प्रक्रिया

Amrit Vichar Network
Edited By Amrit Vichar
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दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र भारत में चुनाव एक ऐसी बुनियाद है, जिस पर लोकतंत्र की इमारत टिकी हुई है। इस बुनियाद को बनाए रखने में स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव से जुड़े सिद्धांत और प्रक्रियाएं अहम भूमिका निभाती हैं। देश का चुनावी परिदृश्य अपने आप में अद्वितीय है। भारत के चुनाव आयोग पर स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव कराने की जिम्मेदारी है। चुनाव आयोग का दायरा और भूमिका काफी बड़ी है। 400 से अधिक राज्य विधानसभा चुनाव,  राष्ट्रपति चुनाव, उपराष्ट्रपति चुनाव और 17 बार आम चुनाव को सफलतापूर्वक कराना काफी बड़ी बात है।

निर्वाचन आयोग ने लोकसभा चुनाव 2024 की तारीखों की घोषणा कर दी है। 543 लोकसभा सीट के लिए चुनाव 19 अप्रैल से एक जून के बीच सात चरणों में होंगे। वोटों की गिनती 4 जून को होगी। करीब 46 दिनों तक चलने वाली ये 1951-52 के बाद दूसरी सबसे लंबी चुनावी प्रक्रिया हैं। यह ठीक है कि जिस चुनाव में लगभग 97 करोड़ मतदाताओं को भागीदारी करनी हो तो समय लगेगा ही।  

2019 में भी सात चरणों में मतदान हुआ था और उसके पहले 2014 में नौ चरणों में, लेकिन 2009 में पांच चरणों में ही चुनाव करा लिए गए थे। 2021 के विधानसभा चुनाव भी 8 फेज में हुए थे। उस समय कहा गया था कि कोरोना के चलते इतने फेज में चुनाव हो रहे हैं। लेकिन इस बार तो ऐसा कुछ नहीं है। 

1951-52 में हुए संसदीय चुनाव चार महीने से ज्यादा समय तक चले थे। वे लोकसभा के लिए स्वतंत्र भारत के पहले चुनाव थे। उस समय परिवहन व संचार के साधन विकास की प्रक्रिया में थे। विपक्ष भी सात चरणों में चुनाव कराने पर सवाल उठा रहा है। विपक्षी दल कह रहे हैं चुनाव तीन से चार फेज में हो सकते थे। देश में 16 मार्च से लागू हुई आचार संहिता 79 दिन तक रहेगी। तीन या चार फेज में चुनाव हो जाते तो आचार संहिता कम समय के लिए लगती।

सात चरणों में चुनाव का मतलब है  कि इस बीच सभी विकास कार्य रुक जाएंगे। एक तरफ विपक्ष लंबे चुनावों पर सवाल खड़े कर रहा है। वहीं भाजपा का तर्क है कि लंबे समय का लाभ सभी पार्टियों को एक जैसा मिलेगा। ये सभी दलों के लिए बराबर समय है। वास्तव में लंबी चुनावी प्रक्रिया खर्चीली ही नहीं, उबाऊ भी होती है और आचार संहिता के चलते बहुत से सरकारी काम ठप हो जाते हैं। अच्छा होता कि कहीं कम चरणों में चुनाव संपन्न कराने के प्रयत्न किए जाते।