बाराबंकी: एक महीने तक चलता था होली का त्यौहार, अब एक दिन में सिमटा
राम सनेही घाट/ बाराबंकी, अमृत विचार। समय के साथ त्यौहार भी सिमटते जा रहे है और एक महीने चलने वाला होली त्यौहार अब महज एक दिन का ही रह गया है। एक समय वह भी था जब बसंत के आगमन के साथ ही ग्रामीण क्षेत्र के लोग होली के रंग में रंग जाते थे और सराररा फागुवा शुरू हो जाता था। लोग होली में रंग खेलने के लिए पलास टेसू, हरसिगार और सेमल के फूल एकत्रित कर सुखाने लगते थे। होली के दिन इन्हीं फूलों से बने प्राकृतिक रंग से ही होली खेली जाती थी। सेमल के लाल चटक फूल बसंत ऋतु में दूर से जंगल में आग लगने का भ्रम पैदा करते थे। हजारों वर्ष से पलाश, सेमल एवं हरसिगार हमारी संस्कृति, औषधि विज्ञान, धार्मिक आयोजन और सामूहिक भोज से जुड़े रहे हैं। क्षेत्र में समय के साथ रंग बनाने वाले वृक्ष भी गायब होने लगे हैं और जंगल समाप्त होने की कगार पर पहुंच गए हैं।
वर्तमान समय में तहसील राम सनेही घाट क्षेत्र के गोकुला, भीखर पुर , देबीगंज, धरौली ,अहमद पुर आदि गांवो में अब यत्र तत्र कुछ वृक्ष बचे हैं।पलाश के पत्तों से बने पत्तल और दोने की आपूर्ति की जाती थी और लोग दुख सुख में इनका इस्तेमाल करते थे। अब हालात यह है कि जंगल समाप्त होकर खेत बन गए हैं। इन वृक्षों की औषधीय महत्ता को ग्रामीण एवं सरकार दोनों ने विस्मृत कर दिया। अब प्राकृतिक रंगों का स्थान शरीर की त्वचा के लिए हानिकारक मिलावटी रंग, वार्निश ने ले लिया हैं।

लक्ष्मी शंकर गुप्ता वरिष्ठ व्यापारी ने बताया 40 वर्ष पहले सेमल एवं पलाश के फूल को सुखा लिया जाता था और सिलबट्टे में पीस कर चूर्ण बना लिया जाता था। इस चूर्ण को कुछ देर के लिए पानी में डालकर छान लिया जाता था फिर समूचा पानी लाल हो जाता था। इसके चूर्ण को गेंदा एवं अपराजिता के फूल को भी सिलबट्टे पर पिसा चूर्ण के साथ मिलाकर पीसा जाता देते हैं। यह मिश्रण प्राकृतिक अबीर बन जाता था और हम सभी एक सप्ताह पहले से होली खेलना शुरू कर देते थे।

भोला नाथ मिश्रा समाज सेवी ने बताया कि फागुनी बयार शुरू होते ही पलास या टेसू, हरसिगार और सेमल के फूल इकट्ठा कर के सुखाने लगते थे। सिलबट्टे में पीस कर चूर्ण बनाकर कर इसी से होली खेला जाता था।लोग बसंत ऋतु शुरू होते गांव गली में फगुआ गाने और हंसी मज़ाक शुरू कर देते थे। पहले खुशबूदार रंग लगाया जाता था लेकिन अब केमिकल युक्त नुकसान दायक रंगों के साथ कीचड़ जले मोबिल को लगाने लगे हैं।

डॉ एम एल साहू (चिकित्सक) कहते हैं कि पलाश के छाल को उबालकर सेवन करने से पथरी एवं यकृत रोग दूर होते हैं। सेमल का पुष्प ही नहीं वरन पंचांग शक्तिवर्धक होते हैं। पाचनतंत्र को ठीक रखने के साथ ही सेमल मधुमेह के लिए उपयोगी है। हरसिगार का प्रयोग वात रोग के लिए सर्वोत्तम है
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