Bareilly News: एक मच्छर...प्रशासन को मतदान प्रभावित होने का डर और शिक्षकों को अपनी जेब की फिक्र

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Edited By Amrit Vichar
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बरेली, अमृत विचार। सरकारी बेसिक स्कूलों में बच्चे तो पूरे साल मच्छरों से जूझते हैं लेकिन प्रशासन की चिंता है कि लोकसभा चुनाव में कहीं वे मतदान को भी प्रभावित न कर दें। इसीलिए प्रधानाध्यापकों को स्कूलों की खिड़कियों पर जाली लगाने का आदेश दिया गया है। 

उधर, प्रधानाध्यापक बगैर किसी बजट के हजारों का यह काम अपनी जेब से कराने को तैयार नहीं हैं। जूनियर हाईस्कूल शिक्षक संघ के मंडल अध्यक्ष डॉ. विनोद कुमार शर्मा ने डीएम को पत्र लिखकर बजट की समस्या का समाधान कराने की मांग की है। यह भी कहा है कि बूथों पर उनका विवरण लिखवाने के लिए शिक्षक पहले ही अपनी जेब से पैसा खर्च कर चुके हैं।

ग्रामीण इलाकों में ज्यादातर मतदान केंद्र सरकारी बेसिक स्कूलों में बनाए गए हैं। डीएम की ओर से स्कूलों की खिड़कियों पर चुनाव से पहले जाली लगवाने का आदेश देने के बाद विभागीय अफसरों ने यह जिम्मेदारी प्रधानाध्यापकों पर डाल दी है। मगर इस काम के लिए अलग से कोई बजट जारी नहीं किया गया है।

प्रधानाध्यापकों का कहना है कि डीएम का स्कूलों की खिड़कियों पर जाली लगाने का निर्णय है तो सराहनीय, लेकिन इसके लिए बजट का भी इंतजाम होना चाहिए। कंपोजिट ग्रांट से ही वे लोग यह काम करा सकते थे लेकिन वह मार्च में ही खत्म हो चुकी है।

शिक्षक नेता डॉ. विनोद कुमार शर्मा ने डीएम को पत्र लिखा है कि मतदान कक्षों के बाहर बूथ संख्या बगैरह विवरण लिखवाने की जिम्मेदारी खंड शिक्षा अधिकारियों औरतहसील के कर्मचारियों को सौंपी गई थी लेकिन वह खर्च भी शिक्षकों को अपनी जेब से करना पड़ा है। उन्होंने डीएम से शिक्षकों को आर्थिक बोझ से बचाने के लिए खिड़कियों पर जाली लगवाने के लिए बजट की मांग की है।

एक स्कूल में जाली लगवाने का खर्च आठ से दस हजार
रहपुरा चौधरी उच्च प्राथमिक स्कूल के प्रधानाध्यापक हरीश बाबू शर्मा ने बताया कि ज्यादातर स्कूलों में चार से पांच तक कमरे हैं। हर कमरे में दो खिड़कियां और दो रोशनदान होते हैं। एक कमरे की ही खिड़कियों और रोशनदानों पर जाली लगवाने पर कम से कम दो हजार का खर्च होगा। इस तरह प्रधानाध्यापकों को आठ से दस हजार रुपये तक खर्च करने पड़ेंगे। विभाग की ओर से बजट जारी होता तो प्रधानाध्यापकों को इस परेशानी का सामना नहीं करना पड़ता।

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