सुलतानपुर: चुनौतियों से जूझ रहे डेयरी व्यवसायी को नहीं मिल रही राह, पशुपालन से भंग हो रहा मोह
गोकुल पुरस्कार प्राप्त तिराई मिल्क जोन में पशु चिकित्सा का अभाव
धनपतगंज/सुलतानपुर, अमृत विचार। चुनौतियों से जूझ रहे क्षेत्र के डेयरी व्यवसाय को चार दशक से कोई राह नहीं मिल सकी। लगातार दो बार प्रदेश स्तर पर दुग्ध उत्पादन में गोकुल पुरस्कार प्राप्त कर कीर्तिमान स्थापित करने वाले तिराई मिल्क जोन में पशुपालन के उन्नयन के लिए सरकारी तौर पर पशु चिकित्सा की समुचित व्यवस्था भी नहीं बन सकी। पशुपालन आधारित जीवन गुजर बसर करने वाले क्षेत्र के हजारों परिवारों के आर्थिक उन्नयन के लिये चुने हुये जनप्रतिनिधियों मे भी इच्छाशक्ति का अभाव बना हुआ है। जिसके चलते ठप हो रहे डेयरी व्यवसाय से ग्रामीण बेरोजगारी बढ़ने के संकेत मिल रहे है।
विकास क्षेत्र धनपतगंज ही नहीं जनपद में गोमती नदी के तटवर्ती गांव जिन्हें तराई क्षेत्र कहा जाता है, इस क्षेत्र के अधिकांश बाशिंदों का मुख्य व्यवसाय पशुपालन है। दुग्ध व्यवसाय इनके रोजी-रोटी का आधार है। इसी क्षेत्र का एक हिस्सा धनपतगंज का तराई इलाका है। जिसके तहत नौगवां, सोती, मुडुवा, सडांव गया दत्त का पुरवा, जज्जौर माधवपुर, कोलिया, बगियवा जैसे सैकड़ों गांव हैं, जहां ग्रामीण गाय और भैंस पालकर दूध व्यवसाय लंबे समय से करते चले आ रहे हैं।
पर, इस व्यवसाय को लेकर सरकारी उपेक्षा और जनप्रतिनिधियों की नजरअंदाजी के चलते ग्रामीण अर्थव्यवस्था का यह महत्वपूर्ण क्षेत्र अब बेरोजगारी की राह पर खड़ा हो रहा है। पशु चिकित्सा का अभाव और पशुपालन की नई उन्नत सील तकनीकी जानकारी के अभाव में पशुपालन की दुश्वारियां बढ़ गई है। डेयरी उद्योग का दायरा भी सिमटता जा रहा है। पशुपालन से लोगों का मोह भंग हो रहा है। सरकार भी इस क्षेत्र के मूल व्यवसाय को बचाने और उसके उन्नयन को लेकर कुछ बेहतर नहीं कर सकी है।
क्या कहतें है पशुपालक
दो बार गोकुल पुरस्कारपाने वाली सडांव गांव की डेयरी संचालिका कुशला सिंह का कहना कि दुग्ध व्यसाय से आय की असीम संभावनाओं को देखते हुये तीन दशक पहले जो सपना देखा था वह सब फेल हो रहा है। वर्ष 2002 में एक गाय से दुग्ध व्यवसाय शुरु किया और वर्ष 2007 में 110 विभिन्न हरियाणा, शाहीवाल, जर्सी, फ्रिजियन, गंगातीरी, थारपारकर जैसी नश्ल की गायों की डेयरी खड़ी की। प्रदेश स्तर पर प्रतिदिन 4 कुंतल से अधिक दुग्ध उत्पादन का रिकॉर्ड बनाया।

प्रदेश पशुपालन मंत्रालय से दो बार गोकुल पुरष्कार भी मिला। क्षेत्र की सैकड़ों महिलाओं ने पशुपालन शुरू किया। लेकिन, समय के साथ चिकित्सा महंगी होती गयी। कैटल फीड के रेट भी चार गुना से ज्यादा बढ़ गये। लेकिन सरकारी तौर पर इलाके मे समुचित पशु चिकित्सा की व्यवस्था आज तक नहीं बन सकी। दूध के सरकारी रेट का निर्धारण भी नहीं हुआ। पशुपालकों को पशुपालन की नई तकनीकी के प्रशिक्षण की भी व्यवस्था नहीं बन सकी। यहां तक कि संक्रामक रोगों के समय से टीकाकरण तक की व्यवस्था सरकार नहीं बना पाती है। पशु मृत्यु दर बढ़ी। पशु घटते गये। अब महज 35 गायों की डेयरी रह गयी है। आने वाले दिनांे में इसे भी बंद करना पड़ेगा।

औदहा गांव के पशुपालक अशोक कहते है कि पशुपालन अब घाटे का सौदा बन गया है। दुग्ध समितियां भी समुचित कीमत नहीं दे रही हैं। पशुओं के रखरखाव पर खर्च अधिक और चिकित्सा महंगी है। जन प्रतिनिधि वोट लेकर चले जाते है। लेकिन तराई मिल्कजोन में एक पशुचिकित्सालय तक की व्यवस्था नहीं बना पा रहे हैं। आने वाले दिनों में यह व्यवसाय बंद होगा और ग्रामीण बेरोजगारी बढ़ेगी।
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