उत्तराखंड: ईवीएम गड़बड़ी मामले में नैनीताल हाई कोर्ट का फैसला सुरक्षित
नैनीताल। उत्तराखंड विधानसभा चुनावों में इलेक्ट्रोनिक वोटिंग मशीनों (ईवीएम) में गड़बड़ी को लेकर दायर विभिन्न याचिकाओं की पोषणीयता (वैधता) के मामले में बुधवार को सुनवाई पूरी हो गई और उच्च न्यायालय ने इस मामले में अपना निर्णय सुरक्षित रखा लिया है। न्यायमूर्ति लोकपाल सिंह की अदालत में भारतीय जनता पार्टी के निर्वाचित विधायकों की ओर …
नैनीताल। उत्तराखंड विधानसभा चुनावों में इलेक्ट्रोनिक वोटिंग मशीनों (ईवीएम) में गड़बड़ी को लेकर दायर विभिन्न याचिकाओं की पोषणीयता (वैधता) के मामले में बुधवार को सुनवाई पूरी हो गई और उच्च न्यायालय ने इस मामले में अपना निर्णय सुरक्षित रखा लिया है। न्यायमूर्ति लोकपाल सिंह की अदालत में भारतीय जनता पार्टी के निर्वाचित विधायकों की ओर से दायर प्रार्थना पत्र पर सिविल प्रक्रिया संहिता के आदेश सात नियम 11 के तहत बुधवार को सुनवाई की।
प्रतिवादियों की ओर से कहा गया कि कांग्रेस के हारे प्रत्याशियों की ओर से दायर याचिकाओं में वाद का कारण नहीं है। इसलिये याचिकाएं वैध नहीं हैं। उन्होंने अदालत से मांग की कि सभी याचिकाओं को खारिज किया जाए। दूसरी ओर याचिकाकर्ताओं की ओर से कहा गया कि ईवीएम से छेड़छाड़ के माध्यम से चुनाव धांधली हुई है। चुनाव अधिकारी के आदेश के विपरीत अन्य मशीनों का चुनाव में प्रयोग किया गया है। चुनाव से पहले ही जीते प्रत्याशियों के समर्थकों की ओर से चुनाव नतीजे घोषित कर दिए गए हैं जो कि वाद के लिए पर्याप्त कारण हैं। याचिकाकर्ताओं की ओर से यह भी कहा गया कि प्रतिवादियों की ओर से मुख्य याचिका पर जवाब विलंब से दाखिल किया गया है जो कि गलत है।
दोनों पक्षों को सुनने के बाद अदालत ने अपना निर्णय सुरक्षित रख लिया। यह मामला वर्ष 2017 में हुए उत्तराखंड विधानसभा चुनावों से जुड़ा हुआ है। कांग्रेस के लगभग छह हारे प्रत्याशियों नवप्रभात, राजकुमार, अम्बरीश कुमार, गोदावरी थापली एवं विक्रम सिंह ने 2017 में ईवीएम में गड़बड़ी को लेकर उच्च न्यायालय में अलग-अलग याचिकाएं दायर की थीं।
याचिकाकर्ताओं के अधिवक्ता रवीन्द्र सिंह बिष्ट ने बताया कि भाजपा के चुने हुए विधायकों मुन्ना सिंह चैहान, खजानदास, आदेश कुमार चैहान, गणेश जोशी और विजय सिंह पंवार की ओर से एक प्रार्थना पत्र देकर सिविल प्रक्रिया संहिता के आदेश सात और नियम 11 के तहत याचिका की पोषणीयता पर सवाल उठाये गये थे। इस पर उच्च न्यायालय ने अपना निर्णय सुरक्षित रख लिया।
