आपत्तिजनक बयान
बिहार विधानसभा चुनाव की सभा में केंद्रीय गृह राज्यमंत्री नित्यानंद राय ने कहा कि अगर जनता दल की सरकार बनेगी तो कश्मीर के आतंकी यहां (बिहार) पनाह लेंगे। उनके इस विवादित बयान को लेकर बिहार की सियासत गरमा गई है। विपक्षी दलों ने भाजपा पर जहर उगलने वाली बयानबाजी का आरोप लगाया है। इसकी शिकायत …
बिहार विधानसभा चुनाव की सभा में केंद्रीय गृह राज्यमंत्री नित्यानंद राय ने कहा कि अगर जनता दल की सरकार बनेगी तो कश्मीर के आतंकी यहां (बिहार) पनाह लेंगे। उनके इस विवादित बयान को लेकर बिहार की सियासत गरमा गई है। विपक्षी दलों ने भाजपा पर जहर उगलने वाली बयानबाजी का आरोप लगाया है। इसकी शिकायत भारत निर्वाचन आयोग से करने की बात भी कही जा रही है।
वैसे तो लोकतंत्र में सबको अपने विचारों की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है लेकिन इस स्वतंत्रता के नाम पर जब कोई सीमा ही लांघ जाए तो तो सवाल उठने लाजिमी हो जाते हैं। ऐसा करने वाला जब जिम्मेदार पद पर हो तो उससे पद की गरिमा के अनुरूप विचार, आचरण और व्यवहार की उम्मीद की जाती है। बिहार में नित्यानंद राय का यह बयान क्या केन्द्रीय गृह राज्यमंत्री के पद की गरिमा के अनुकूल है? दरअसल, लोकतंत्र की यह विडंबना है कि यहां आग उगलने वाले बयानों का प्रतिकार कार्रवाई के रूप में नहीं किया जाता।
लोकसभा चुनाव के दौरान भी भाजपा, कांग्रेस और अन्य दलों के नेताओं ने भड़काऊ बयान खुलेआम दिए। भाजपा के कई नेताओं ने खुलकर बयानबाजी की थी तब भाजपा के अध्यक्ष अमित शाह के एक भड़काऊ बयान के बाद उत्तर प्रदेश में उनकी चुनावी सभा पर रोक लगा दी गई थी। गिरिराज किशोर, साध्वी प्राची ने हिंदुत्व को धार देने के लिए आपत्तिजनक बयान दिए थे तो रामपुर से सपा नेता आजम खां की जयाप्रदा को लेकर की गई टिप्पणी पर भी काफी हो-हल्ला मचा था। उन्होंने रामपुर के तत्कालीन जिलाधिकारी पर भी गैरमर्यादित भाषा में टिप्पणी की थी।
चुनाव के दौरान नेताओं की ओर से आपत्तिजनक और भड़काऊ बयान दिए जाने के कई मामले भारतीय चुनाव आयोग तक गए लेकिन आयोग ने उन पर सिर्फ चेतावनी देकर इतश्री कर ली। केंद्रीय वित्त राज्यमंत्री अनुराग ठाकुर के दिल्ली दंगे के दौरान बयान की भी विपक्षी दलों ने जमकर अलोचना की थी। अक्सर ऐसे बयान से कई नेता सुर्खियों में बने रहने का काम करते हैं।
सियासत में पक्ष-विपक्ष में आरोप प्रत्यारोप स्वाभिक है लेकिन जब इसमें नेता शालीनता और और गैर जिम्मेदाराना बयानबाजी की हद लांघ जाएं और उनके बयान माहौल खराब करने वाले हों तो इस पर लगाम जरूरी हो जाता है। चूंकि चुनाव के दौरान की गतिविधियों के लिए निर्वाचन आयोग को स्वतंत्र संस्था के रूप में माना जाता है इसलिए उसकी अहम जिम्मेदारी बनती है कि वह ऐसे मामलों में कुछ ऐसे सख्त कदम उठाएं जिसमें भड़काऊ बयान पर लगाम लग सके।
