हवा में फिर जहर
राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (एनसीआर) और दिल्ली में इन दिनों प्रदूषण का स्तर फिर खतरनाक स्तर तक पहुंच गया है। फिर धुंध छाने लगी है। एक तरफ इन दिनों पराली जलाए जाने का सीजन है तो दूसरी ओर प्रदूषण के हमारे नियमित कारक भी अपनी उसी शैली में आ गए हैं, जो लाकडाउन के पहले थे। …
राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (एनसीआर) और दिल्ली में इन दिनों प्रदूषण का स्तर फिर खतरनाक स्तर तक पहुंच गया है। फिर धुंध छाने लगी है। एक तरफ इन दिनों पराली जलाए जाने का सीजन है तो दूसरी ओर प्रदूषण के हमारे नियमित कारक भी अपनी उसी शैली में आ गए हैं, जो लाकडाउन के पहले थे। मार्च में जब लाकडाउन हुआ था तो उसके बाद प्रदूषण का स्तर बहुत ही कम हो गया था। इतना कम कि हवा में छाई रहने वाली नियमित धुंध भी गायब हो गई थी। नजारा ऐसा था कि बरेली, मुरादाबाद जैसे शहरों से हिमालय के दर्शन हो रहे थे। यह वाकई में हैरान करने वाला नजारा तो था मगर यह बात साफ थी कि हमने अपने आसमान को जरूरत से ज्यादा ही प्रदूषित कर दिया है।
लाकडाउन के दौरान न केवल प्रदूषण के स्तर में कमी आई बल्कि कई देशों में समुद्र की सतहों पर फैलने वाला प्रदूषण इस कदर गायब हो गया कि वहां तमाम विलुप्त प्रजाति के जीवों की संख्या में बढ़ा इजाफा हो गया। नदियों के पानी की शुद्धता बढ़ गई। गर्मी के दिनों में तापमान भी कमी रिकॉर्ड की गई।
मगर जून माह के बाद जैसे ही अनलाक की प्रक्रिया शुरू हुई तो फिर प्रदूषण अपने ढर्रे पर आ गया। जाहिर है इसके पीछे की वजह भी हम ही हैं। अब दिल्ली, एनसीआर में छाई धुंध की वजह से यहां आवश्यक सेवाओं को छोड़कर डीजल-पेट्रोल जनरेटर बंद करने का निर्णय लिया गया है। इसके लिए बकायदा एक कंट्रोल रूम भी बना दिया गया है, जो हर घंटे प्रदूषण के आंकड़े जारी करेगा। सरकार की ओर से बनाई गई टीमें औचक निरीक्षण करेंगी।
दरअसल, प्रदूषण इस वक्त दुनिया की सबसे बड़ी चिंता है, मगर इसे दूर करने के लिहाज से कभी भी कहीं गंभीर प्रयास होते नहीं दिखे हैं। प्रदूषण कम करने, नदियों का प्रदूषण घटाने के नाम पर हर वर्ष अरबों का बजट जारी किया जाता है मगर इसका क्या परिणाम क्या होता है यह जग जाहिर है। गंगा नदी के प्रदूषण कम करने के नाम पर अब तक तमाम परियोजनाओं पर ही खरबों रुपया खर्च हो चुका है, मगर प्रदूषण जस का तस रहा। लाकडाउन के दिनों में गंगा का पानी भी स्वच्छ नजर आने लगा।
मुद्दा यहां सरकारी योजनाएं लाने का नहीं, मजबूत इच्छा शक्ति का है। केवल प्रदूषण खत्म करने के नाम पर पैसा जारी कर देने भर से प्रदूषण जैसे विकराल संकट से निजात नहीं मिल सकती। अगर ऐसा होता तो दिल्ली फिर धुंध की चपेट में नहीं होती। केंद्र सरकार के साथ ही राज्य सरकारों को भी इस दिशा में गंभीरता से काम करने की आवश्यकता है। दिल्ली का उदाहरण एक चेतावनी है। इससे सबक लेकर प्रदूषण कम करने की दिशा में ठोस पहल की शुरुआत जल्द होनी चाहिए।
