केवल संदेह और अनुमान के आधार पर लाइसेंस रद्द करना अनुचित :High court
प्रयागराज, अमृत विचार। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने लाइसेंस रद्दीकरण के एक मामले में महत्वपूर्ण आदेश देते हुए कहा कि किसी ठोस सामग्री या साक्ष्य के बिना केवल संदेह के आधार पर लाइसेंस रद्द करने का कठोर दंड नहीं दिया जा सकता है। संयुक्त प्रांत उत्पाद शुल्क अधिनियम, 1910 की धारा 34 (2) के तहत शक्ति का प्रयोग तभी किया जा सकता है, जब ऐसे लाइसेंसधारी का एक और लाइसेंस धारा 34(1) के उपखंड (ए),(बी) और (सी) के तहत रद्द किया जा चुका हो। कोर्ट ने आगे स्पष्ट किया कि धारा 34(2) में दिए गए प्रावधान बहुत कठोर हैं। इसके तहत लाइसेंस शर्तों के उल्लंघन के बिना भी लाइसेंस रद्द किया जा सकता है। हालांकि उक्त धारा का प्रयोग विवेकाधीन है और इसे स्वचालित रूप से लागू नहीं किया जा सकता है। उक्त आदेश न्यायमूर्ति सौमित्र दयाल सिंह और न्यायमूर्ति डोनाडी रमेश की खंडपीठ ने फतेहपुर निवासी संदीप सिंह की याचिका को स्वीकार कर उसकी दुकान के लाइसेंस को रद्द करने के आदेश को खारिज करते हुए पारित किया।
दरअसल याची की शराब की दुकान का लाइसेंस बिना किसी लाइसेंस शर्तों के उलंघन के उक्त धारा के तहत रद्द कर दिया गया था। कोर्ट ने पाया कि अधिकारियों ने मझेनपुरवा की दुकान का लाइसेंस केवल इस आधार पर रद्द कर दिया कि उसकी गेहरूखेड़ा की दुकान का लाइसेंस पहले ही रद्द किया जा चुका है। हालांकि इसके अलावा रद्दीकरण का कोई ठोस कारण नहीं बताया गया। कोर्ट ने आगे कहा कि गेहरूखेड़ा की दुकान के मामले में बोतलों के साथ छेड़छाड़ का साक्ष्य मिला था जबकि मझेनपुरवा में दुकान का लाइसेंस रद्द करने से पहले ऐसा कोई नमूना एकत्र नहीं किया गया था। अंत में कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि केवल संदेह के आधार पर लाइसेंस रद्द नहीं किया जा सकता है।
ये भी पढ़ें -सुप्रीम कोर्ट आदेश के बाद निर्वाचन आयोग ने एसएलयू संबंधी दिशा निर्देश में किया संशोधन
