बरेली: अतिक्रमण ज्यों का त्यों! एक हजार करोड़ रुपए से ज्यादा चुकाई कीमत...जाम से राहत फिर भी नहीं

Amrit Vichar Network
Edited By Amrit Vichar
On

शिवांग पांडेय, बरेली। एक नजर में यह जानना दिलचस्प है कि इस शहर में अतिक्रमण को रोक पाने में सिस्टम की नाकामी की एवज में अब तक एक हजार करोड़ रुपये से भी ज्यादा कीमत चुकाई जा चुकी है। इसके बावजूद अतिक्रमण भी बढ़ रहा है और जाम भी।

+8948
फोटो- कोहाड़ापीर चौराहे पर करीब डेढ़ घंटे लगा जाम

अफसरों और जनप्रतिनिधियों की निगाह में जाम की समस्या का एक ही हल है कि शासन से करोड़ों मंजूर कराकर कोई नया पुल बना दिया जाए, लेकिन सड़कों को पूरी तरह अतिक्रमणमुक्त किए जाने में कहीं वोटों और कहीं नोटों का ऐसा पेच फंसा हुआ है कि ऐसी कोई योजना पर कई साल से कोई ठोस काम नहीं हुआ है।

शहर में जाम से निपटने की कोशिशों की शुरुआत करीब 45 साल पहले हुई थी, जब किला रेलवे क्रॉसिंग के ऊपर पहला ओवरब्रिज बनाया गया था। उस वक्त दिल्ली की ओर जाने के लिए यह एकमात्र रास्ता हुआ करता था, लिहाजा जब भी रेलवे क्रॉसिंग बंद होती थी तो सड़क पर ट्रैफिक रुक जाता था। 

शहर से गुजरने वाले रास्तों पर दूसरी रेलवे क्रॉसिंग भी लंबे समय जाम का कारण बनती रहीं, लेकिन वर्ष 2000 शुरू होने के साथ शहर में बढ़ता अतिक्रमण और बड़ी समस्या बन गया। इस समस्या से निपटने के लिए फ्लाईओवर बनने की शुरुआत हुई। करोड़ों के कई और प्रोजेक्ट स्थापित हुए लेकिन अतिक्रमण रोकने की एक नाकामी इन प्रोजेक्ट को एक-एक कर फेल करती रही। इस शहर को यह नाकामी तमाम परियोजनाओं पर फूंकी गई सैकड़ों करोड़ की रकम से भी ज्यादा भारी पड़ चुकी है।

चिंता की बात यह है कि अब भी शहर हर तरफ जाम की उसी भयावह समस्या में उलझा हुआ है। शहर के सिविल लाइंस, बरेली कॉलेज रोड, शहामतगंज, कुतुबखाना, चौपुला, बदायूं रोड और सेटेलाइट जैसे प्रमुख इलाकों में हर दिन लगा रहने वाला जाम सवाल खड़ा कर रहा है कि यहां करोड़ों के पुल बनाने की परियोजनाएं शुरू करने से पहले अतिक्रमण पर काबू पाने की ठोस कोशिश क्यों नहीं की गई। हालांकि यह चिंता करने के बजाय शहर को जाममुक्त बनाने के लिए और परियोजनाओं का खाका सरकारी दस्तावेजों में खींचा जा रहा है।

ट्रांसपोर्टनगर
शहर में ट्रकों की वजह से जाम और हादसे सिरदर्द बन जाने के बाद शाहजहांपुर रोड पर करीब 50 करोड़ की शुरुआती लागत से ट्रांसपोर्टनगर का निर्माण कराया गया था। बाद में इसे और विकसित करने के लिए करोड़ों का खर्च और किया गया। करीब 22 साल बाद भी यह ट्रांसपोर्टनगर पूरी तरह आबाद नहीं हो पाया है।

भारी वाहन अब भी शहर में जाम लगा रहे हैं। बरेली ट्रक ऑनर्स एंड ट्रांसपोर्टर वेलफेयर एसोसिएशन के अध्यक्ष शोभित सक्सेना कहते हैं कि सुविधाएं न होने की वजह से ट्रांसपोर्टर्स ट्रांसपोर्टनगर नहीं गए। अब अधिकांश ट्रांसपोर्टरों के दफ्तर किला के लीचीबाग और शहामतगंज में चल रहे हैं। यहीं गाड़ियां खड़ी होती हैं। ट्रांसपोर्ट नगर पार्किंग बनकर रह गया है।

चौपुला ओवरब्रिज
चौपुला पर रेलवे क्रॉसिंग की वजह से जाम लगने के कारण 2003 में ओवरब्रिज बनाने की शुरुआत की गई। यह पुल 2009 में बनकर तैयार हो पाया। अब करीब 80 करोड़ की लागत से अटल सेतु भी बन चुका है। लेकिन इसके बाद भी चौपुला चौराहे पर जाम लग रहा है।

वजह यह है कि इस चौराहे पर भारी अतिक्रमण होने के साथ डग्गामार गाड़ियों और निजी बसों के कई अवैध अड्डे चल रहे हैं। इनसे ट्रैफिक पुलिस को होने वाली नाजायज कमाई का यह असर है कि मुख्यमंत्री की ओर से कई बार आदेश दिए जाने के बावजूद ये अवैध अड्डे कभी हट नहीं पाए। लखनऊ और दिल्ली हाईवे को जोड़ने वाला चौराहा होने के कारण यहां से 24 घंटे भारी यातायात गुजरता है, इस वजह से हर दिन जाम लगा रहता है।

शहामतगंज पुल
जून 2013 में तत्कालीन मुख्यमंत्री अखिलेश यादव की घोषणा के बाद 25 अक्टूबर 2016 को इस फ्लाईओवर के लिए भूमि पूजन हुआ 21 जनवरी 2018 को इसका लोकार्पण किया गया। इस पर कुल 40.30 करोड़ रुपये की लागत आई। पुल बनने के बाद भी यह इलाका जाम से जूझ रहा है।

वजह पुल के नीचे बड़े पैमाने पर अवैध कब्जे हैं। ऐन चौराहे पर टेंपों वालों के साथ डग्गामार गाड़ियों के भी अवैध अड्डे हैं। दुकानकारों ने भी काफी सड़क घेर रखी है। हालत यह है कि पुलिस चौकी के सामने ही कभी-कभी इस कदर ई रिक्शा और टेंपो खड़े हो जाते हैं कि जाम लग जाता है। पुल के चौड़े पिलर भी जाम का कारण बने रहते हैं।

कुतुबखाना पुल
कुतुबखाना पुल पर भी 111 करोड़ की भारीभरकम रकम खर्च की गई है। हाल ही में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने इसका उद्घाटन किया था। इस पुल को शहर की लाइफलाइन बताया गया था लेकिन जाम अब भी वैसा ही है जैसे पहले लगता था। मुख्य कारण पुल के नीचे और आसपास बेतहाशा अतिक्रमण और बाजार में बेतरतीब खड़े होने वाले वाहन हैं।

इसके अलावा कोतवाली से लेकर कोहाड़ापीर तक सड़क पर खड़े होने वाले ठेले भी ट्रैफिक गुजरने में बाधक हैं। टेंपो और ई रिक्शा की भरमार ने समस्या को विकराल कर रखा है। ठेले वाले कहते हैं कि कुतुबखाना चौकी के पुलिस वाले उनसे दिन में दो बार 10- 10 रुपये की वसूली कराते हैं। पुल बनने से पहले 20-20 रुपये लिए जाते थे।

सेटेलाइट पुल
शाहजहांपुर रोड पर यह पुल इतनी चौड़ी सड़क पर बनाया गया जिसे अतिक्रमण हटाकर सिक्स लेन भी किया जा सकता था। यह पुल 2020 में बनकर तैयार हुआ था लेकिन जाम की समस्या खत्म कर पाने में नाकाम साबित हुआ।

पुल बनने के बाद इसके आसपास की सड़कों पर अतिक्रमण और बढ़ गया। बस स्टैंड के आसपास डग्गामार बसों, टेंपो-ऑटो, ई रिक्शा और इको जैसी गाड़ियों के अवैध अड्डों ने सड़क को इतना तंग कर रखा है कि उस पर सुगमता से ट्रैफिक नहीं गुजर पाता। पीलीभीत रोड और शहामतगंज रोड पर ईसाईयों की पुलिया तक कई बार इतना भीषण जाम लगता है कि लोग पनाह मांग जाते हैं। इसी रोड पर आगे रामवाटिका के बाहर सड़क पर साप्ताहिक सनडे बाजार लगता है तो हालात और बेकाबू हो जाते हैं।

ओवरब्रिज बनने से मिली राहत
सैकड़ों करोड़ की लागत से शहर में बने फ्लाईओवर जरूर अतिक्रमण की वजह से अनुपयोगी साबित हो रहे हैं लेकिन रेलवे क्रॉसिंग के ऊपर बनाए गए ओवरब्रिज लोगों को राहत दे रहे हैं। इनमें 21 करोड़ से बना हार्टमैन पुल, 19 करोड़ से बना कुदेशिया पुल, 63 करोड़ से बना आईवीआरआई पुल और करीब 95 करोड़ की लागत से बना लालफाटक पुल शामिल हैं।

सड़कें चौड़ी होने से भी नहीं मिली पूरी राहत
शहर में पिछले बरसों में कई सड़कों को चौड़ा किया गया है लेकिन अतिक्रमण बढ़ जाने की वजह से इसका भी ज्यादा लाभ नहीं मिला। अब 50 करोड़ से भी ज्यादा लागत से कई और सड़को को चौड़ा करने की योजना है। उम्मीद की जा सकती है कि ये सड़कें चौड़ी होने के बाद कुछ राहत मिलेगी।

यह भी खर्च बेकार
- 167 करोड़ की लागत से स्मार्ट सिटी में आई ट्रिपल सी प्रोजेक्ट स्थापित किया गया, इसके जरिए अतिक्रमण भी नजर रखी जानी थी लेकिन यह उपयोग नहीं हो पा रहा है।

- 5.62 करोड़ की लागत से मल्टीलेवल मैकेनिकल कार पार्किंग स्मार्ट सिटी के तहत बन तो गई है लेकिन अभी इसे शुरू ही नहीं किया जा सका है।

- 50.0 करोड़ रुपये यातायात पुलिस के लिए नए वाहनों, उपकरणों और प्रशिक्षण पर खर्च किए गए लेकिन वह इसका कोई खास उपयोग नहीं कर पाई।

- 25.0 करोड़ रुपये का खर्च लोगों में यातायात नियमों के प्रति जागरूकता बढ़ाने के लिए अभियान चलाने पर किया गया लेकिन कारगर नहीं रहा।

यह भी पढ़ें- बरेली: यहां तो बिन बारिश के ही जलभराव, गंदे पानी से होकर निकल रहे लोग

 

संबंधित समाचार