पीलीभीत: रेड रॉट के बाद गन्ने में लगा कंडुआ रोग, हो रहा भारी नुकसान...किसानों की बढ़ी चिंता

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Edited By Amrit Vichar
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पीलीभीत,अमृत विचार: रेड रॉट के बाद अब गन्ने की फसल पर कंडुआ रोग ने धावा बोला है। किसानों के मुताबिक इस फफूंद जनित रोग से विशेषकर पेड़ी गन्ने को खासा नुकसान हो रहा है। गन्ना विभाग के अधिकारियों के मुताबिक अगर समय से इसकी रोकथाम नहीं की गई तो यह हवा के साथ अन्य पौधों में भी फैल सकता है।

इस रोग से अगली पीढ़ी की फसल भी बर्बाद होने की आशंका बनी रहती है। जिला गन्ना अधिकारी ने इस रोग के प्रति किसानों को आगाह करते हुए इससे बचाव के तौर-तरीकों की जानकारी दी है।
तराई के इस जिले में तापमान में दिनदिनों बढ़ोत्तरी हो रही है। तापमान बढ़ने के साथ जिस तरह गन्ने की फसल पर कीटों का प्रकोप बढ़ा है, उसी तरह बीमारियां का प्रकोप भी बढ़ रहा है।

इन दिनों पेड़ी गन्ने की फसल पर कंडुआ रोग ने धावा बोला है। इस रोग का सबसे ज्यादा असर गन्ने के प्रजाति कोशा 13235 की पेड़ी में दिखाई दे रहा है। जिला गन्ना अधिकारी खुशीराम भार्गव के मुताबिक गन्ने की कंडुआ बीमारी फफूंदजनित बीमारी है। इस रोग के लक्षण अप्रैल से जून तक दिखाई देते हैं।

गन्ने मे लाल सड़न रोग के बाद यह दूसरी सबसे बड़ी बीमारी है। उनके मुताबिक अगर समय से इसका उपचार न किया गया तो यह बीमारी हवा के साथ पूरे खेत मे फैल जाती है। इसका दुखद पहलू यह भी है कि इस रोग से अगली पीढ़ी भी प्रभावित हो जाती है।

कंडुआ रोग के यह है लक्षण
पेड़ी गन्ने में कंडुआ रोग के लक्षण बहुत पहले देखे जा सकते हैं। जिला गन्ना अधिकारी ने बताया कि कंडुआ रोग लगने पर गन्ने की फसल में किल्ला पाइप के आकार का निकलता है। इस संरचना के अंदर काला पावडर भरा होता है। तने के परिपक्व होने पर यह फट जाता है और हवा के साथ बीजाणू पूरे खेत में फैलकर फसल को संक्रमित कर देते हैं। इस बीमारी से 20 से 30 प्रतिशत फसल प्रभावित हो जाती है।

डीसीओ ने किसानों को कंडुआ रोग से बचाव के बताए तरीके
जिला गन्ना अधिकारी खुशीराम भार्गव ने गन्ना विकास परिषद के गांव कनाकोर एवं अधकटा में किसानों को कंडुआ रोग से बचाव के तौर तरीके बताए। उन्होंने बताय कि कंडुआ रोग से बचाव के लिए रोगग्रस्त पौधों को पॉलीथिन से ढककर नीचे से उखाड़ लेना चाहिए और इसके बाद उसे ज़मीन मे दबा देना चाहिए।

रोगग्रस्त पौधों को जलाना नहीं चाहिए। इस कार्य के सबसे मुफीद वक्त सुबह का होता है। उन्होंने उपचार के संबंध में बताया कि कारबेंडाजिम 12 प्रतिशत व मैकोजेब 63 प्रतिशत की 800 ग्राम मात्रा को 200 लीटर पानी में घोल बनाकर पूरे खेत में पौधों पर छिड़काव करना चाहिए।

बुवाई से पहले बीज के टुकड़ों को करबेंडाजिम 0.2 प्रतिशत घोल से उपचारित अवश्य करें। इसकी वजह यह है कि यह बीमारी संक्रमित बीज के टुकड़ों से फैलती है। रोगरोधी किस्मों का चुनाव, ग्रीष्मकालीन गहरी जुताई एवं फसल चक्र से इस बीमारी को नियंत्रित किया जा सकता है।

इस दौरान उन्होंने दोनों गांवों में चल रहे गन्ना सर्वे कार्य का भी निरीक्षण किया। इस मौके पर एलएच मिल के महाप्रबंधक गन्ना केबी शर्मा, गन्ना पर्यवेक्षक राजकमल मिश्रा, किसान कृष्णपाल, खेम करन, नासिर, जगदंवा प्रसाद, दाताराम आदि मौजूद रहे।

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