प्रयागराज : मूल आवेदन से अलग नए तथ्यों के साथ पुनरीक्षण याचिका विचारणीय नहीं

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Edited By Amrit Vichar
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अमृत विचार, प्रयागराज। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक मामले में सुनवाई के दौरान अधीनस्थ न्यायालयों की भूमिका और कार्य को स्पष्ट करते हुए कहा कि न्यायालय का कर्तव्य रिकॉर्ड पर उपलब्ध तथ्यों पर भली प्रकार विचार कर एक न्यायोचित आदेश पारित करना है। अगर न्यायालय अपना कार्य गंभीरतापूर्वक नहीं करेंगे तो संभव है कि न्याय के लक्ष्य को पाना कठिन हो जाएगा।

कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला देते हुए पुनरीक्षण न्यायालय की क्रियाविधि पर आपत्ति जताते हुए कहा कि तथ्यों से परे पुनरीक्षण पर विचार नहीं किया जा सकता है, जो मूल आवेदन का हिस्सा ना हों। पुनरीक्षण मूल आवेदन में उल्लिखित तथ्य तक ही सीमित होना चाहिए। सीपीसी के आदेश 13 नियम 10(1) के तहत मूल आवेदन से अलग पुनरीक्षण आवेदन में किसी भी नए तथ्य को शामिल करते हुए उस पर अंतरिम आदेश पारित करना कानून की दृष्टि से गलत है।

उक्त आदेश न्यायमूर्ति नीरज तिवारी की एकलपीठ ने गोपाल जी अग्रवाल की याचिका को स्वीकार कर पुनरीक्षण न्यायालय, आजमगढ़ द्वारा पारित विवादित आदेश को रद्द करते हुए पारित किया। कोर्ट ने पुनरीक्षण न्यायालय के साथ-साथ निष्पादन न्यायालय की भूमिका को भी स्पष्ट करते हुए कहा कि निष्पादन न्यायालय उस निर्णय और डिक्री की अपील पर सुनवाई नहीं कर सकता, जिसे निष्पादित किया जाना है। वह निर्णय और डिक्री की वैधता की जांच भी नहीं कर सकता।

उक्त न्यायालय के पास निर्णय और डिक्री से आगे जाने का कोई क्षेत्राधिकार नहीं होता है, लेकिन उसे निष्पादित करने का अधिकार है। अंत में कोर्ट ने मौजूदा मामले में  निष्पादन न्यायालय को कानून के अनुसार मौजूदा मामले में आगे बढ़ने और तथ्यों पर विचार करते हुए जल्द से जल्द निष्पादन कार्यवाही पूरी करने का निर्देश दिया।

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