लोकप्रियता का फर्जीवाड़ा

Amrit Vichar Network
Edited By Amrit Vichar
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देश में टेलीविजन चैनलों द्वारा कथित रूप से टीआरपी (टेलीविजन रेटिंग प्वाइंट) बढ़ाने के लिए पैसे का सहारा लेकर लोकप्रियता हासिल करने की होड़ का जिस तरह से खुलासा हुआ है उससे न केवल इलेक्ट्रानिक मीडिया की गरिमा को ठेस पहुंची है बल्कि टीवी चैनलों के प्रति लोगों के रवैये में भी बदलाव भी आएगा। …

देश में टेलीविजन चैनलों द्वारा कथित रूप से टीआरपी (टेलीविजन रेटिंग प्वाइंट) बढ़ाने के लिए पैसे का सहारा लेकर लोकप्रियता हासिल करने की होड़ का जिस तरह से खुलासा हुआ है उससे न केवल इलेक्ट्रानिक मीडिया की गरिमा को ठेस पहुंची है बल्कि टीवी चैनलों के प्रति लोगों के रवैये में भी बदलाव भी आएगा। मामला भले ही एक दो टीवी चैनलों की आपसी होड़ में इस भंडाफोड़ के खुलासे का हो, मगर बदनामी पूरी इलेक्ट्रानिक इंडस्ट्री की हुई है।

बात यहां तक पहुंच गई है कि टीआरपी फर्जीवाड़े की जांच अब सीबीआई से कराई जाएगी और इसके लिए केंद्र सरकार ने अधिसूचना जारी कर दी है। इस बात से समझा जा सकता है कि यह मामला कितना संवेदनशील, गंभीर और टीवी चैनलों की नकारात्मक भूमिका का है। सीबीआई जांच की सिफारिश सही भी है क्योंकि पूरे मामले में लोगों को यह जानने का हक है कि आखिर टीवी चैनलों का यह खेल था क्या।

टीवी चैनलों ने टीआरपी बढ़ाने के लिए अगर कोई खेल खेला है तो यह दर्शकों के साथ ठगी तो है ही इसने चैनलों के उन विज्ञापनदाताओं का भरोसा भी तोड़ा है जो इन्हें अरबों रुपयों का विज्ञापन मुहैया कराते हैं। एक अनुमान के मुताबिक देश में साल भर में करीब 34 हजार करोड़ रुपये का प्रचार तंत्र काम करता है। इसमें करीब 80 फीसदी विज्ञापन के रूप में और उसमें भी बड़ा हिस्सा टीवी चैनलों के विज्ञापन के रूप में खर्च किया जाता है। चूंकि इस पैसे में चैनलों का हिस्सा एक तरह से उसकी टीआरपी से तय होता है, लिहाजा टीआरपी बढ़ाने के लिए कई चैनल और ब्रॉडकास्टिंग कंपनियां बाहरी लोगों की मिलीभगत से टीआरपी के आंकड़ों में गड़बड़ी करती हैं।

टीआरपी की गड़बड़ी के पीछे चैनलों का सैंपल साइज भी बड़े हद तक जिम्मेदार है। हमारे देश में करीब 24 करोड़ घरों में टीवी देखा जाता है। जाहिर है इतनी बड़ी संख्या में यह तय कर पाना कठिन है कि कौन से टीवी में कौन सा चैनल देखा जा रहा है। लिहाजा यह तय करने के लिए सरकार की ओर से टीवी चैनलों का जो सैंपल साइज तय किया है, वह 44 हजार के आसपास है। यह ठीक वैसे ही है जैसे किसी मामले में राय के लिए तय जनसंख्या से एक निश्चित मात्रा में राय लेकर परिणाम निकाला जाता है।

चूंकि टीआरपी के लिए सैंपल साइज 44 हजार के आसपास है, लिहाजा फर्जीवाड़े के लिए बड़ी संख्या में चैनलों ने बाहरी लोगों की मदद से यहां सेंधमारी कर टीवी चैनलों में अपने चैनल चलवा दिए। जैसा कि जांच के तथ्यों में बात सामने आ रही है। अब सीबीआई जांच के बाद इस बात का खुलासा होगा कि इस फर्जीवाड़े में कौन लोग किस तरह से शामिल थे। उम्मीद की जानी चाहिए कि यहां दूध का दूध और पानी का पानी होगा, ताकि षडयंत्र के एक बड़े तंत्र का खुलासा हो सके।