निकिता हत्याकांड

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Edited By Amrit Vichar
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हरियाणा के बल्लभगढ़ का निकिता तोमर हत्याकांड इसलिए समाज को झकझोर देने वाली घटना है क्योंकि यह प्रेम-प्रस्ताव ठुकराने के किसी लड़की के निर्णय की हिंसक परिणति है। क्या आज भी किसी लड़की को यह हक नहीं कि वह शादी किससे करेगी? इसका नितांत व्यक्तिगत फैसला खुद ले सके? दुर्भाग्यपूर्ण है कि हम ऐसे हिंसक …

हरियाणा के बल्लभगढ़ का निकिता तोमर हत्याकांड इसलिए समाज को झकझोर देने वाली घटना है क्योंकि यह प्रेम-प्रस्ताव ठुकराने के किसी लड़की के निर्णय की हिंसक परिणति है। क्या आज भी किसी लड़की को यह हक नहीं कि वह शादी किससे करेगी? इसका नितांत व्यक्तिगत फैसला खुद ले सके? दुर्भाग्यपूर्ण है कि हम ऐसे हिंसक लोगों के बीच में हैं जो किसी के व्यक्तिगत निर्णयों को समझने के बजाय उन पर अपनी आदम जमाने की सोच को थोपना चाहते हैं।

इस हत्याकांड में गिरफ्तार तौसीफ ने पुलिस पूछताछ में बताया कि निकिता किसी और से शादी करने वाली थी इसलिए उसने अपने दोस्त रेहान के साथ मिलकर उसकी हत्या कर दी। निकिता के परिजनों का आरोप है कि हत्यारोपी निकिता पर धर्म बदलकर शादी करने का दबाव डाल रहा था जिसके लिए वह तैयार नहीं थी।

प्रथम दृष्टया जो तथ्य पुलिस की जांच में अब तक सामने आए हैं उससे एक बात तो साफ हो रही है कि मृतका निकिता और मुख्य हत्यारोपी तौसीफ में जान-पहचान पहले से ही थी। यह जान-पहचान इतनी बढ़ी होगी कि तौसीफ (जैसा की उसने स्वीकार किया है) निकिता से शादी करना चाहता था। संभव है कि शादी के लिए निकिता पर धर्म बदलने का भी दबाव बनाया गया हो, जिसके लिए वह तैयार नहीं हुई हो। वहीं, एक बात तो समझ में आ रही है कि तौसीफ से शादी के लिए निकिता के परिवार वाले तैयार नहीं हुए होंगे।

यहां तक तो सब ठीक है। ऐसे मामलों में यह होता ही है कि युवक या युवती में से किसी एक के परिवार वाले शादी को तैयार नहीं होते या किसी और कारण से शादी नहीं हो पाती। न जाने कितने ही ऐसे मामले हुए हैं लेकिन यह कहां तक उचित है कि शादी न होने पर कोई भी हिंसा का रास्ता अख्तियार कर ले। मुख्य आरोपी तौसीफ ने जो किया, वह तो किसी दशा में क्षम्य नहीं है और उसे कानून के मुताबिक सजा मिलनी चाहिए लेकिन इस मामले में यह सवाल अहम हो गया है कि क्या कोई लड़की अपने जीवन से जुड़ा सबसे अहम फैसला नहीं ले सकती?

अगर एक लड़की एक लड़के के प्रेम प्रस्ताव को इन्कार कर देती है तो यह लड़के के लिए उसके अहम का मुद्दा कैसे बन जाता है। क्यों ऐसे मर्दों को न का मतलब समझ नहीं आता? क्यों हमारे समाज में सिर्फ लड़कियों को लिए ही नियम, कायदे बनाये जाते हैं, वहीं लड़कों को दूसरों की भावनाओं की इज्जत करना तो दूर, लड़की की न को स्वीकारना तक नहीं सिखाया जाता? सवाल बहुत हैं लेकिन जाने क्यों उनकी चर्चा सिर्फ निकिता, प्रियंका, निर्भया जैसे मासूमों के मौत पर ही शुरू होती है।