बिहार का इंतजार

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Edited By Amrit Vichar
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बिहार विधानसभा के चुनाव के लिए मतदान के सभी चरण निपट चुके हैं। अब नतीजों का इंतजार है। 10 नवंबर को मतगणना होनी है। इसमें साफ हो जाएगा कि बिहार की सत्ता इस बार किसकी होगी। स्थिति साफ होने में ज्यादा वक्त नहीं रह गया है लेकिन अब तक मिले रुझान और एग्जिट पोल तो …

बिहार विधानसभा के चुनाव के लिए मतदान के सभी चरण निपट चुके हैं। अब नतीजों का इंतजार है। 10 नवंबर को मतगणना होनी है। इसमें साफ हो जाएगा कि बिहार की सत्ता इस बार किसकी होगी। स्थिति साफ होने में ज्यादा वक्त नहीं रह गया है लेकिन अब तक मिले रुझान और एग्जिट पोल तो यही बता रहे हैं कि इस बार नितीश कुमार की वापसी नहीं हो रही है। ज्यादातर एग्जिट पोल किसी भी गठबंधन को पूर्ण बहुमत न मिल पाने की बात बोल रहे हैं।

यदि नतीजे एग्जिट पोल के मुताबिक आए तो यह बात स्पष्ट होती है कि बिहार वालों का मानस बदला है। वहां के वोटरों ने राज्य की सरकार बनाने में स्पष्ट मत नहीं रखा है। वोटर इस बार भी बंटे हैं। नितीश कुमार की वापसी न हो पाने के रुझान से यह भी स्पष्ट हो रहा है कि अबकी बहुतायत में बिहार वालों ने अपने मुद्दों को तरजीह दी है। इस वजह से नितीश की सत्ता से उनकी नाराजगी जायज भी है।

कोरोना संकटकाल की शुरुआत में देश भर में लगाए गए लॉकडाउन के दौरान बाहर से बिहार लौटने के लिए वहां के मजदूरपेशा लोगों को तमाम दुश्वारियां झेलनी पड़ीं। अपने राज्य लौटने पर भी उनको कोई राहत नितीश कुमार सरकार नहीं दे पाई। बेरोजगार हुए बिहार के लाखों लोगों के सामने आर्थिक संकट खड़ा हो गया।

दूसरा मुद्दा बिहार के बेरोजगार नौजवानों को लेकर था। सुशासन बाबू अपने कार्यकाल के दौरान युवाओं को रोजगार दे पाने में पूरी तरह से नाकामयाब साबित हुए। बिहार वालों की और भी तमाम बुनियादी दिक्कतें हैं। विकास की दृष्टि से पिछड़े इस राज्य में औद्योगिक क्रांति लाने का वायदा कोरा ही साबित हुआ है। कानून व्यवस्था कभी पटरी पर नहीं लाई जा सकी। बिजली, पानी, सड़क जैसी सुविधाओं के लिए भी लोग मोहताज हैं। तमाम इलाके आज भी शिक्षा से वंचित हैं। सरकारी तंत्र में भ्रष्टाचार बेलगाम है। इसका शिकार सीधे तौर पर आम जनता ही हाेती रही है।

ऐसे में, मौजूदा नितीश सरकार से मतदाताओं की नाराजगी स्वाभाविक तौर पर राज्य के चुनाव में दिखनी ही थी। चूंकि भाजपा नितीश की सत्ता में सहभागी थी इसलिए अपरोक्ष तौर पर उसके लिए भी जनता ने जिम्मेदार माना है। यह दीगर बात है कि भाजपा ने नितीश से कन्नी काटकर यह संदेश देने की हर बार कोशिश की है कि प्रत्यक्ष तौर पर सत्ता की चाबी उसके हाथ में नहीं रही।

जाहिर है कि राज्य में सत्ता किसी की भी रही, बिहार वालों की बुनियादी समस्याओं का कभी समाधान नहीं हो सका। चुनाव से पहले बड़े-बड़े वायदे करने वाले सियासी दल कुर्सी पाते ही सत्ता सुख भोगने लगे और केंद्रीय बजट पर अपनी निर्भरता दिखाकर बहानेबाजी करते रहे। इस बार राज्य की सत्ता में कोई भी आसीन हो जाए लेकिन बिहार की जनता को क्या हासिल होगा? यह सवाल खड़ा ही रहेगा।