बिहार के नतीजे
बिहार विधानसभा चुनाव के नतीजे सबके सामने हैं। यह पहला विधानसभा चुनाव था जो लालू प्रसाद यादव और राम विलास पासवान की गैरमौजूदगी में लड़ा गया। जेल में बंद लालू की राजद की लालटेन को उनके बेटे तेजस्वी ने जितनी मजबूती से उठाया वहीं राम विलास पासवान के बेटे चिराग पासवान उतने ही हाशिए पर …
बिहार विधानसभा चुनाव के नतीजे सबके सामने हैं। यह पहला विधानसभा चुनाव था जो लालू प्रसाद यादव और राम विलास पासवान की गैरमौजूदगी में लड़ा गया। जेल में बंद लालू की राजद की लालटेन को उनके बेटे तेजस्वी ने जितनी मजबूती से उठाया वहीं राम विलास पासवान के बेटे चिराग पासवान उतने ही हाशिए पर पहुंच गए। मतगणना के परिणाम इसे साबित करते हैं।
हालांकि यह सब समझते रहे कि चिराग ने अपनी भूमिका भाजपा के इशारे पर ही सीमित रखी। इसमें कोई दोराय भी नहीं कि पासवान का लोकजनशक्ति दल राजद मजबूती से चुनाव नहीं लड़ा। इसका खमियाजा चिराग ने भुगता है।
लालू की गैरमौजूदगी में भी तेजस्वी यादव राजग विरोधी महागठबंधन के मुखिया बतौर मजबूत चेहरा बनकर उभरे हैं। राजद को पिछले चुनाव से भी ज्यादा सीटें मिलना इस बात के संकेत हैं कि नितीश कुमार को चुनौती देने के लिए बिहार की जनता ने उनको मजबूत विकल्प के तौर पर चुना है।
तेजस्वी ने जिस तेवर से नितीश कुमार को चुनाव में चुनौती दी उससे वह विपक्ष के सबसे मजबूत नेता के रूप में उभर गए हैं। ऐसे में यह चुनाव लालू की दूसरी पीढ़ी के तौर पर तेजस्वी यादव के मजबूती से सियासत में कदम रखने के लिए भी जाना जाएगा और इसमें तेजस्वी के चुनाव लड़ने के तौर-तरीकों की बड़ी भूमिका रही। उन्होंने बेरोजगारी के नाम पर न सिर्फ नितीश कुमार को घेरा बल्कि कई नारों के साथ युवाओं को खूब आकर्षित किया। यही वजह है कि राजद को इतनी सीटें मिल सकीं।
महागठबंधन में शामिल कांग्रेस राजद को जिताने में पूरा जोर लगाए रही लेकिन बिहार में भाजपा के उभार में वह पिछले विधानसभा चुनाव जितनी 27 सीटें भी हािसल नहीं कर पाई। जािहर है कि बिहार की जनता ने कांग्रेस को किसी स्तर पर नहीं गिना और महागठबंधन में हाथ का पंजा हाशिए पर आ गया। यह स्थिति तब है जब चुनाव प्रचार के दौरान कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को निशाने पर बनाए रखा।
बहरहाल, माना जा सकता है कि भाजपा राष्ट्रवाद और हिंदुत्व को धार देकर बिहार में कमल खिला पाने में कामयाब हो गई है। जो बिहार जातीय समीकरणों के लिए जाना जाता रहा वह अब राष्ट्रवाद और हिंदुत्व की ओर आकर्षित हो गया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की जनसभाओं में यही दोनों विषय केंद्र में रहे थे। हालांकि राजद को मिली इतनी ज्यादा सीटें यह भी जाहिर कर रही हैं कि लालू प्रसाद के कुशासन के उनके कटाक्ष को जनता ने नहीं माना।
