वैश्विक सहमति की बाधाएं
प्लास्टिक प्रदूषण का असर हर जगह दिख रहा है। माइक्रोप्लास्टिक हवा, पानी और यहां तक कि मां के दूध में भी पाया गया है। विशेषज्ञों का कहना है कि अगर उत्पादन और कचरे पर रोक नहीं लगी तो 2050 तक प्लास्टिक उत्पादन तीन गुना हो जाएगा। प्लास्टिक को विघटित होने में 20 से 500 वर्ष तक का समय लग सकता है, जिसके कारण लैंडफिल और प्राकृतिक आवासों में प्लास्टिक अपशिष्ट का विशाल संचय हो जाता है।
प्लास्टिक अपशिष्ट की बढ़ती मात्रा के बावजूद, द लैंसेट द्वारा वर्ष 2023 में किए गए एक अध्ययन के अनुसार, केवल 9 प्रतिशत प्लास्टिक अपशिष्ट का ही पुनर्चक्रण किया जाता है। यह अक्षमता प्रदूषण संकट को और बढ़ा देती है। पिछले दिनों बुसान में प्लास्टिक प्रदूषण से निपटने के लिए एक बड़ा कदम मानी जा रही अंतर्राष्ट्रीय संधि की कोशिशें नाकाम हो गई हैं। यानी प्लास्टिक संधि पर आम सहमति बनने की राह में बाधाएं आ रही हैं। सवाल है कि वैश्विक प्लास्टिक संधि वार्ता आम सहमति तक क्यों नहीं पहुंच सकी? भारत का रुख यह था कि किसी भी संधि से राष्ट्रीय विकास की आकांक्षाओं को नुकसान नहीं पहुंचना चाहिए। अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन में पनामा के नेतृत्व में 100 से अधिक देश चाहते हैं कि प्लास्टिक उत्पादन पर रोक लगाई जाए। उनका कहना है कि उत्पादन कम किए बिना प्रदूषण रोकना संभव नहीं।
वैश्विक प्लास्टिक संधि पर भारत पॉलीमर उत्पादन पर सीमाओं का विरोध करता है। हालांकि भारत ने प्लास्टिक अपशिष्ट को रोकने के लिए कई कदम उठाए हैं, जिनमें अल्पकालिक प्लास्टिक पर प्रतिबंध लगाना और विस्तारित उत्पादक उत्तरदायित्व (ईपीआर) व्यवस्था लागू करना शामिल है, फिर भी उसने प्रस्तावित लक्ष्यों का विरोध किया है और कहा है कि ऐसे नियम देश के विकास को नुकसान पहुंचा सकते हैं। भारत का मानता है कि प्लास्टिक समाप्ति का फैसला चरणबद्ध तरीके से होना चाहिए और इसमें स्थानीय परिस्थितियों को ध्यान में रखा जाना चाहिए। प्लास्टिक प्रदूषण खत्म करने को लेकर आम राय बनाने की राह में एक बाधा ये भी है कि इसे लेकर सभी देशों का क्या नजरिया हो?
फिर भी अर्थव्यवस्था के लिए प्लास्टिक की अपरिहार्यता भारत के लोगों, इसकी इकोलॉजी और समुद्री पर्यावरण पर स्वास्थ्य संबंधी असर के मूल्यांकन को लेकर कार्रवाई में देरी का स्थायी बहाना नहीं हो सकती। फिलहाल बातचीत रुक गई है, संभावना है कि ये देश अगले साल फिर मिलेंगे। भारत ने उन देशों के साथ खड़ा होना चुना है, जो उत्पादन कटौतियों के खिलाफ हैं, पर उसे यह स्वीकार करना ही होगा कि प्लास्टिक को पुनर्चक्रित (रीसायकल) करने की उसकी क्षमता हर साल नए आने वाले प्लास्टिक की महज लगभग एक-तिहाई ही है। अभी सवाल यह है कि क्या समय रहते सभी देश एकमत हो पाएंगे।
