दुरुपयोग के खिलाफ
कोई भी कानून समाज और पारिवारिक ताने-बाने को सुरक्षित रखने के उद्देश्य से बनाया जाता है, मगर जब उसका दुरुपयोग होने लगता है, तो वही कानून सामाजिक बुनियाद के लिए गंभीर खतरा भी पैदा कर देता है। देश की सर्वोच्च अदालत ने मंगलवार को तेलंगाना हाईकोर्ट के एक फैसले को खारिज करते हुए कहा कि दहेज कानून का दुरुपयोग बंद होना चाहिए। गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी ऐसे वक्त आई है जब बेंगलुरु में नौकरी कर रहे बिहार के एक इंजीनियर अतुल सुभाष की आत्महत्या का मामला देशभर में गूंज रहा है।
अतुल सुभाष के विरुद्ध उसकी पत्नी ने दहेज उत्पीड़न तथा हत्या के प्रयास समेत नौ मामले दर्ज करवाए थे। दहेज प्रताड़ना के 2023 के पहले दर्ज मामले आईपीसी की धारा 498 के तहत चलाए जाते थे, भारतीय न्याय संहिता बन जाने के बाद अब दहेज प्रताड़ना के मामलों को धारा 85-86 के तहत दर्ज किया जाता है। यह कहने में कोई गुरेज नहीं होना चाहिए कि दहेज प्रथा भारतीय समाज के लिए एक कलंक बन गई है। लड़का-लड़की दोनों ने एक दूसरे के परिवार को प्रताड़ित करने के लिए इस कुप्रथा को मजबूत हथियार बना लिया है। हालांकि इस कानून का मूल उद्देश्य महिलाओं को दहेज उत्पीड़न से बचाना है और काफी हद तक इस कानून ने प्रभावशाली ढंग से काम किया और आज भी दहेज जैसी कुप्रथा के विरुद्ध असरदार बना हुआ है।
2015 और 2023 के बीच दहेज प्रताड़ना के करीब सवा लाख मामले गांवों से लेकर महानगरों में उच्चशिक्षित से लेकर अल्पशिक्षित परिवारों ने दर्ज करवाए। दहेज प्रथा को खत्म करने के लिए सख्त कानून बनाने के अलावा केंद्र तथा राज्य सरकारों ने सामाजिक संगठनों की मदद से व्यापक जन जागरूकता भी की, लेकिन समाज के बदलते स्वरूप, पारिवारिक तथा व्यक्तिगत आकांक्षाओं के चलते परिवार में टकराव भी बढ़ने लगे। इससे तलाक के मामले तो बढ़ ही रहे हैं, साथ ही दहेज प्रताड़ना के मामले भी बहुत बड़ी संख्या में पुलिस-अदालतों के सामने पहुंचने लगे।
इन सबके बीच दहेज कानून का सामना कर रहे लोगों की आत्महत्या के मामले भी सामने आने लगे। पिछले दो दशकों में अदालतों ने दहेज उत्पीड़न के मामलों की सुनवाई के दौरान यह पाया कि पति से मनमुटाव के बाद बदला लेने की नीयत से भी दहेज प्रताड़ना के झूठे मामले दर्ज करवाए जा रहे हैं। भारतीय संस्कृति में परिवार तथा विवाह संस्था का महत्वपूर्ण स्थान है। इस दिशा में कानून तो अपना काम कर ही रहा है, परिवार और समाज को भी यह सुनिश्चित करना होगा कि किसी कानून का दुरुपयोग न हो तथा विवाह संस्था की पवित्रता बरकरार रहे। विवाह संस्था भी महिला सुरक्षा तथा सशक्तिकरण का मजबूत मंच है। उसे और मजबूत करना समाज की सबसे महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है।
