दीप पर्व
दीपावली पर्व है रोशनी का। रोशनी यानी उजियारा। उजियारा दीपक करता है। इसीलिए इस पर्व के प्रतीक दीप हैं। यह दीप रोशनी करते हैं। अंधकार को मिटाते हैं। अंधकार मिटता है तो समूचा वातावरण जगमग हो जाता है। दीपावली की परंपरा अंधेरे को मिटाकर रोशनी करने की ही है। यह रोशनी वातावरण में ही नहीं …
दीपावली पर्व है रोशनी का। रोशनी यानी उजियारा। उजियारा दीपक करता है। इसीलिए इस पर्व के प्रतीक दीप हैं। यह दीप रोशनी करते हैं। अंधकार को मिटाते हैं। अंधकार मिटता है तो समूचा वातावरण जगमग हो जाता है। दीपावली की परंपरा अंधेरे को मिटाकर रोशनी करने की ही है। यह रोशनी वातावरण में ही नहीं जीवन में भी होनी चाहिए। इसीलिए दीपावली कोे जीवन से जोड़ा गया है। जीवन में रोशनी आती है तो मन उल्लास से भर उठता है। मन में यदि उल्लास है तो सारे जग में उजियारा है। ऐसा ही माना जाता है।
दीपावली का पर्व तो सिर्फ एक दिन मनाया जाता है लेकिन उस एक दिन जैसा उल्लास हम सबके जीवन में सदैव बना रहे तो हर दिन उल्लास का होता। आशय यह कि हम मन को उल्लास से भरपूर रखें। यह तभी होगा जब हम सकारात्मक रहें। सकारात्मक तभी रहेंगे जब हम ईर्ष्या-दुर्भावना, लोभ-लालच, मद-मोह से दूर रहेंगे।
नकारात्मकता हावी होती है तो कई मानस रोग जैसे- काम, क्रोध, लोभ, मोह, मान, मद, शोक, चिन्ता, उद्वेग, भय, विषाद और दम्भ इत्यािद हमारे मन-मास्तिष्क में घर बना लेते हैं इसलिए कहा गया है कि हमारे अंदर सद्भावना, परोपकार, ईमानदारी जैसे गुण होने चाहिए। यही नैतिक मूल्य हैं। सामजिक सिद्धांत हैं। दीपावली पर दीप भी यही संदेश देते हैं। बस, हमें इनका निहितार्थ समझने की आवश्यकता है।
इस बार की दीपावली ऐसे वक्त में है, जब कोरोना काल चल रहा है और हम सब इससे जूझ रहे हैं। सबक यह कि हम सावधानी बरतें। इसमें कोई कोताही हुई तो परिणाम हम सबके लिए घातक होंगे। दीपावली पर हम पटाखे जलाते हैं। इसके दुष्परिणाम प्रदूषण के रूप में सामने आते हैं। दिल्ली में इसलिए पटाखों को प्रतिबंधित किया गया है। पटाखे मानव जीवन और जीव-जतंुओं के लिए भी घातक हैं। इसको हम सबको गंभीरता से लेना होगा।
विचारणीय है कि एक दिन पटाखे जलाकर हम लोग हजारों रुपये फूंक देते हैं लेकिन इसका नतीजा क्या निकलता है? प्रदूषण। हर साल दीपावली के बाद वायु और ध्वनि प्रदूषण बढ़ जाता है तो हम यह काम करें ही क्यों? दीपावली की सांस्कृतिक परंपरा में तो पटाखे जलाना अनिवार्य नहीं है फिर हम ऐसा क्यों करें?
बेहतर हो पटाखे जलाने के नाम पर हम जो हजारों रुपये फूंक देते हैं, उनका सदुपयोग किसी जरूरतमंद के चेहरे पर खुशी लाकर करें तो न सिर्फ हम किसी का भला कर पाएंगे बल्कि अपने मन को खुशी दे पाएंगे और इससे हमें अात्मिक संतोष की भी अनुभूित होगी। समझना आपको है कि आप क्या करते हैं। दीप पर्व दीपावली की अनंत शुभकामनाएं।
