प्रदूषण और राजनीति
प्रदूषण का मुद्दा भी राजनीति का कारण बन चुका है। देश में अब वॉटर प्यूरीफायर के बाद एयर प्यूरीफायर भी बिकने लगे हैं। पिछले कई वर्षों से बढ़ते प्रदूषण के कई मामले सर्वोच्च न्यायालय से लेकर एनजीटी तक पहुंचे हैं, जहां से कड़े फैसले भी लिए गए हैं, लेकिन उन पर अमल करने में राजनैतिक …
प्रदूषण का मुद्दा भी राजनीति का कारण बन चुका है। देश में अब वॉटर प्यूरीफायर के बाद एयर प्यूरीफायर भी बिकने लगे हैं। पिछले कई वर्षों से बढ़ते प्रदूषण के कई मामले सर्वोच्च न्यायालय से लेकर एनजीटी तक पहुंचे हैं, जहां से कड़े फैसले भी लिए गए हैं, लेकिन उन पर अमल करने में राजनैतिक इच्छाशक्ति का अभाव देखा जा रहा है। माना जा रहा है कि पंजाब, हरियाणा और उत्तर प्रदेश के कुछ इलाकों में पराली जलाने के अलावा गाड़ियों से निकलने वाला काला धुआं, निर्माण कार्यों से उड़ने वाले पीएम कण, सड़कों पर फैली धूल और उद्योगों से होने वाले उत्सर्जन के कारण प्रदूषण बढ़ रहा है। यह स्थिति सामान्य नहीं है कि देश के कई शहर वायु प्रदूषण का शिकार हों और लोगों को शुद्ध हवा में सांस लेने के बुनियादी अधिकार से भी वंचित होना पड़े।
पिछले दिनों सर्वोच्च न्यायालय ने राष्ट्रीय राजधानी में स्मॉग टॉवर न लगने पर भी नाराजगी जताई थी। अब इन स्मॉग टॉवर को लेकर भी विवाद उठ रहे हैं। विवाद इसी को लेकर है कि स्मॉग टॉवर वायु प्रदूषण की समस्या का हल नहीं है और यह प्रदूषण उत्पन्न करने वाले कारकों पर कोई प्रभाव नहीं डालता है। वायु प्रदूषण के सबसे बड़े स्रोत कल कारखाने और थर्मल पॉवर प्लांट हैं। प्रदूषण उत्पन्न करने वाले इन असल स्रोतों पर कोई आंच नहीं आए इसीलिए कभी पराली जलाने को वायु प्रदूषण के लिए जिम्मेदार ठहरा दिया जा तो और कभी कोई और तर्क दे दिए जाते हैं। जबकि सरकार कोयला क्षेत्र को निजी खनन के लिए खोलकर देश की हवा को और अधिक जहरीला बनाने के इंतजाम कर रही है। विकास के नाम पर पेड़ों की कटाई, नदियों-तालाबों को पाटना और प्राकृतिक संसाधनों का दोहन अब भी जारी है।
प्रदूषण कम करने के लिए पेड़ों की धूल हटाने का अभियान, सड़कों की धुलाई करना, धूल उड़ने से रोकने के लिए कैमिकल युक्त पानी का छिड़काव, निर्माण गतिविधियों में धूल रोकने के मानकों का पालन, इन सब उपायों पर तुरंत अमल होना चाहिए था, लेकिन इसमें कोताही देखी जा रही है।
लॉकडाउन के कारण पर्यावरण में काफी सुधार आया है, इस बात की काफी खुशी मनाई जा रही थी, जो अब बेअसर साबित हो चुकी है। विडंबना है कि हम एक ओर नई गाड़ियों की बिक्री होने का जश्न मनाते हैं। दूसरी ओर पराली जलाने नाम पर किसानों को खलनायक बनाते हैं।
