संपादकीय: रेवड़ियों के खिलाफ
बीते कई वर्षों से सरकारों द्वारा मुफ्त की योजनाओं से देश में एक ऐसा वर्ग तैयार होता जा रहा है, जिसको परजीवी की संज्ञा दी जा सकती है। यह स्थिति किसी भी देश के भविष्य के लिए ठीक नहीं कही जा सकती है। बुधवार को सुप्रीम कोर्ट ने मुफ्त की योजनाओं पर सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि मुफ्त की योजनाओं की वजह से लोग काम करने से कतराते हैं। उन्हें मुफ्त में राशन मिल रहा है। बिना काम किए पैसे मिल रहे हैं।
कोर्ट ने सरकारों पर सख्त रुख अपनाते हुए यह भी कहा कि हम लोगों को लेकर आपकी चिंताओं को समझते हैं, लेकिन क्या ये बेहतर नहीं होगा कि लोगों को समाज की मुख्यधारा में लाया जाए और राष्ट्र के विकास में उन्हें योगदान करने देना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी पूर्ण रूप से वाजिब है। इसलिए और भी वाजिब है, क्योंकि मुफ्त की योजनाओं को पार्टियों ने चुनाव जीतने का हथियार तो बना ही लिया है, साथ ही यह देश के आर्थिक विकास में भी बड़ा रोड़ा है। देश में धीरे-धीरे मुफ्त योजनाओं की वजह से यह स्थिति बनती भी रही है। देश के अस्सी करोड़ से अधिक लोगों को मुफ्त राशन, विभिन्न वर्गों को नगदी हस्तांतरण, बिजली-पानी की मुफ्त योजनाओं के कारण कई राज्यों की सरकारों पर कर्ज का बोझ लगातार बढ़ रहा है। यह स्थिति किसी भी विकासशील देश के लिए निश्चित तौर पर उत्साहजनक नहीं कही जा सकती है।
यह बात कहने में भी कोई गुरेज नहीं होना चाहिए कि जब व्यक्ति की आवश्यकताएं बिना मेहनत के पूर्ण होने लगें तो वह आलस या काहिली का शिकार हो जाता है और मेहनत से जी चुराने लगता है। सरकारों को चाहिए कि मुफ्त देने के बजाय जनता को स्वाबलंबी बनाने के लिए रोजगार के नए-नए अवसर सृजित करें, जिससे लोग स्वावलंबी के साथ-साथ स्वाभिमानी भी बनें। देश की तरक्की और विकास की दृष्टि से मुफ्त की योजनाएं घातक ही कही जा सकती हैं। यदि देश की जनता को इसी तरह मुफ्त की रेवड़ियां मिलती रहीं तो भविष्य में लोग इसे अपना अधिकार समझने लगेंगे और उसी पार्टी की सरकार बनाना चाहेंगे, जिसकी रेवड़ियां ज्यादा मीठी होंगी।
दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के लिए यह संकेत अच्छे नहीं कहे जा सकते हैं। इसलिए और नहीं कहे जा सकते हैं, क्योंकि इससे दुनिया में भारतीय लोकतंत्र की अच्छी छवि नहीं बनेगी। लोकतंत्र की पवित्रता को दूषित करने के लिए किसी एक दल को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता है, बल्कि सभी दल इसके लिए समान रूप से दोषी हैं। सरकारों को समझना होगा कि जनता के कल्याण के लिए कोई भी योजना चलाना गलत नहीं है, लेकिन योजनाएं ऐसी चलाई जाएं, जिससे राष्ट्रनिर्माण की प्रक्रिया मजबूत हो, मानव संसाधन का सदुपयोग हो तथा भारत आलसी नहीं, मेहनतकश राष्ट्र बने।
