बरेली: निजी कॉलेजों ने खुद ही लॉक कर लीं सीटें
बरेली, अमृत विचार। निजी कॉलेज में अधिक फीस होने के चलते विद्यार्थी वहां का रुख नहीं कर रहे हैं। इसके बावजूद उन पर प्रवेश लेने का दबाव बनाया जाता है। इसके लिए निजी कॉलेज स्वयं ही विद्यार्थियों की सीट अपने कॉलेज में लॉक कर दे रहे हैं। विद्यार्थी को इसका पता तब चल रहा है …
बरेली, अमृत विचार। निजी कॉलेज में अधिक फीस होने के चलते विद्यार्थी वहां का रुख नहीं कर रहे हैं। इसके बावजूद उन पर प्रवेश लेने का दबाव बनाया जाता है। इसके लिए निजी कॉलेज स्वयं ही विद्यार्थियों की सीट अपने कॉलेज में लॉक कर दे रहे हैं। विद्यार्थी को इसका पता तब चल रहा है जब वह अपने मनचाहे कॉलेज में प्रवेश लेने पहुंच रहे हैं।
बरेली कॉलेज में ग्रीवांस सेल में भी ऐसे कई विद्यार्थी पहुंचे हैं जिन्हें कॉलेज ने प्रवेश तो दे दिया लेकिन जब सीट लॉक करने की बारी आयी तो पता चला कि उनकी सीट किसी निजी कॉलेज में पहले से ही लॉक है। इसकी वजह से विद्यार्थियों को परेशान होना पड़ रहा है। यह खेल निजी महाविद्यालय कैफे संचालकों की मिलीभगत से कर रहे हैं।
बरेली महाविद्यालय में एलएलबी, एमकॉम व एमए पाठ्यक्रमों के प्रवेश चल रहे हैं। कई विद्यार्थी ऐसे पहुंचे जिन्होंने विश्वविद्यालय की वेबसाइट पर आवेदन करने के बाद बरेली महाविद्यालय की वेबसाइट पर भी प्रवेश के लिए आवेदन किया था। उनका अंकों के आधार पर बरेली कॉलेज की मेरिट में भी नाम आ गया। इसकी वजह से मेरिट के आधार पर वह निर्धारित समय में प्रवेश लेने भी पहुंचे। मेरिट लिस्ट में नाम देखने के बाद बरेली कॉलेज ने उनका प्रवेश भी ले लिया।
प्रवेश लेने के बाद जब महाविद्यालय ने सीट लॉक करने का प्रयास किया तो पता चला कि उसकी सीट पहले से ही लॉक है। ऐसे में विद्यार्थी को वापस भेजना पड़ा। अब जब तक विद्यार्थी विश्वविद्यालय से सीट अनलॉक नहीं कराएगा तब तक उसे बरेली कॉलेज में प्रवेश नहीं मिलेगा। कुछ विद्यार्थी तो विश्वविद्यालय पहुंच जाते हैं लेकिन कई ऐसे हैं जो नहीं जाते हैं। उनके पास मजबूरी में निजी कॉलेज में प्रवेश लेना ही होता है।
अधिक फीस की वजह से दिक्कत
बताया जा रहा है कि निजी महाविद्यालयों में विद्यार्थी अधिक फीस होने की वजह से प्रवेश नहीं लेते हैं। वह सबसे पहले सरकारी महाविद्यालय में ही प्रवेश की कोशिश करते हैं। बरेली के अधिकांश विद्यार्थी बरेली महाविद्यालय में ही प्रवेश लेने का प्रयास करते हैं। इसके अलावा सिर्फ वही विद्यार्थी निजी कॉलेज में प्रवेश लेते हैं जिन्हें दूर आने-जाने में दिक्कत होती है। यही वजह है कि निजी महाविद्यालयों की अधिकांश सीटें खाली ही रह जाती हैं। एलएलबी में देखा जाए तो प्राइवेट महाविद्यालयों की अधिकांश सीटें खाली रह गई हैं। एमए के पाठ्यक्रमों का भी यही हाल है। इसी तरह से एमएससी की काउंसिलिंग में भी सरकारी महाविद्यालयों की सभी सीटें भरी जा चुकी हैं।
इस तरह से होता है खेल
निजी महाविद्यालय कैफे संचालकों से साठगांठ कर लेते हैं। वे विश्वविद्यालय की वेबसाइट पर आवेदन करने वाले विद्यार्थियों का रिकार्ड भी किसी तरह से जुटा लेते हैं। सबसे पहले तो स्नातक अंतिम वर्ष के विद्यार्थियों को परिणाम आने के बाद ही मैसेज भेजे जाने लगते हैं। इसके तहत उन्हें महाविद्यालयों के बारे में अच्छी-अच्छी जानकारी देकर प्रवेश के लिए आकर्षित किया जाता है। उनसे फोन पर भी संपर्क किया जाता है। जब विद्यार्थी कैफे में जाकर रजिस्ट्रेशन कराते हैं तो उनका रिकार्ड कैफे संचालकों के पास पहुंच जाता है। कैफे संचालक यह रिकार्ड निजी महाविद्यालयों को दे देते हैं। इसी रिकार्ड के आधार पर महाविद्यालय अपने यहां विद्यार्थियों की सीटें लॉक कर देते हैं।
कई बार तो खुद ही फीस भी जमा कर देते हैं। उसके बाद विद्यार्थी को अपने यहां प्रवेश लेने के लिए फोन किया जाता है। उन्हें फीस में छूट देने का भी लालच दिया जाता है। इसकी वजह से कुछ ही विद्यार्थी अपने मनचाहे महाविद्यालय में प्रवेश ले पाते हैं लेकिन अन्य अभ्यर्थियों को मजबूरी में निजी महाविद्यालयों में प्रवेश लेना होता है।
“कई ऐसे विद्यार्थी पहुंचे जिन्हें मेरिट के आधार पर प्रवेश तो दे दिया गया लेकिन जब सीट लॉक करने की बारी आयी तो पता चला कि उनकी सीट किसी निजी कॉलेज में पहले से ही लॉक है। विद्यार्थी को इस बारे में बताया तो उसने स्वयं सीट लॉक कराने से इनकार किया।” -डा. वीपी सिंह, प्रवेश समन्वयक बरेली कॉलेज
