शिक्षा क्षेत्र का संकट
शिक्षा के क्षेत्र में संसाधनों और दूरदर्शिता की कमी तो पहले से ही थी, लेकिन कोरोना वायरस की वजह से स्थिति और भी खराब हो गई है। शिक्षा क्षेत्र का यह संकट देश के भविष्य के लिए बड़ी त्रासदी साबित हो सकता है। बीते कई महीनों में कोरोना संकट और लाकडाउन के चलते देश में …
शिक्षा के क्षेत्र में संसाधनों और दूरदर्शिता की कमी तो पहले से ही थी, लेकिन कोरोना वायरस की वजह से स्थिति और भी खराब हो गई है। शिक्षा क्षेत्र का यह संकट देश के भविष्य के लिए बड़ी त्रासदी साबित हो सकता है। बीते कई महीनों में कोरोना संकट और लाकडाउन के चलते देश में स्कूल बंद रहे। कोरोना वायरस ने पढ़ाई को भी डिजिटल बना दिया। सरकारों की तरफ से ऑनलाइन शिक्षा की व्यवस्था की गई है, लेकिन कई जगहों पर बच्चों के पास स्मार्टफोन और इंटरनेट की सुविधा का अभाव है। इस कारण वे इसका लाभ नहीं उठा पा रहे हैं।
ऑनलाइन शिक्षा की सुविधा शहरी क्षेत्रों के स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों तक तो पहुंच रही है लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों के बच्चों से यह अभी भी दूर है। कोरोना संकट से बिगड़े आर्थिक हालात में ऑनलाइन पढ़ाई-लिखाई कहीं न कहीं निचले तबके पर जबरन आर्थिक दबाव की वजह भी बन रही है। यानि इसका सबसे ज्यादा प्रभाव ग्रामीण इलाकों में रहने वाले आर्थिक तौर पर कमजोर बच्चों पर होगा। इन बच्चों के माता-पिता आर्थिक दबाव के चलते बच्चों को स्कूल भेजने से मना कर रहे हैं। इसका प्रभाव दीर्घकालिक होने वाला है।
ग्रामीण क्षेत्रों में माता-पिता में जागरूकता का अभाव है ।
जिन इलाकों में बच्चों और शिक्षकों को चॉक और ब्लैकबोर्ड के ज़रिए पढ़ाई करने की आदत है उन्हें व्हाट्सएप और वॉइस रिकॉर्डिंग के ज़रिए नोट्स और वीडियो भेजने का औचित्य नहीं है। इससे उनके सीखने-समझने की क्षमता कम होगी। वैसे भी शहरी और ग्रामीण भारत में इंटरनेट के उपयोगकर्ताओं की संख्या में एक बड़ा अंतर है। देश के शहरी क्षेत्र में इंटरनेट की पहुंच लगभग 64.85 प्रतिशत है, वहीं यह ग्रामीण क्षेत्रों में सिर्फ 20.26 प्रतिशत है।
उत्तर प्रदेश सरकार ने शिक्षकों को व्हाट्सएप समूहों, ऑल इंडिया रेडियो और सामुदायिक रेडियो के माध्यम से शैक्षिक सामग्री भेजने की सलाह दी थी, खासकर उन क्षेत्रों में जहां टीवी कवरेज सीमित है। यह कागज पर एक अच्छा विचार है, लेकिन किसी ने भी व्यावहारिक समस्याओं जैसे कि इंटरनेट कनेक्टिविटी, सक्रिय इंटरनेट उपयोगकर्ताओं की संख्या और ग्रामीण इलाकों में छात्रों के लिए इंटरनेट डेटा पैक की उपलब्धता के बारे में सोचने की जरुरत नहीं समझी। इस तरह से पढ़ाई का नतीजा औपचारिक शिक्षा के मुकाबले अप्रभावी है। इस सबसे बचने के उपाय तलाशे जाने की जरुरत है। जबकि सरकार को कम संसाधन वाले इलाकों में असल जरूरतों को समझने और बेहतर तरीकों से समुचित संसाधन उपलब्ध कराने की आवश्यकता है। हमें भी इसके लिए सामुदायिक स्तर पर काम करना होगा।
