भड़कते किसान
कृषि कानूनों के खिलाफ चल रहे किसान आंदोलन के बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रविवार को मन की बात कार्यक्रम में कहा कि बीते दिनों हुए कृषि सुधारों ने किसानों के लिए नई संभावनाओं के द्वार खोले हैं। कृषि कानूनों को काफी विचार विमर्श के साथ कानूनी स्वरूप दिया गया। इन सुधारों से न सिर्फ …
कृषि कानूनों के खिलाफ चल रहे किसान आंदोलन के बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रविवार को मन की बात कार्यक्रम में कहा कि बीते दिनों हुए कृषि सुधारों ने किसानों के लिए नई संभावनाओं के द्वार खोले हैं। कृषि कानूनों को काफी विचार विमर्श के साथ कानूनी स्वरूप दिया गया। इन सुधारों से न सिर्फ किसानों के अनेक बंधन समाप्त हुए हैं, बल्कि उन्हें नए अधिकार और नए अवसर भी मिले हैं।
इन कानूनों के विरोध में उत्तर प्रदेश, हरियाणा और पंजाब के किसान उद्वेलित हैं। किसान चाह रहे हैं कि नए कानून में फसलों के न्यूनतम समर्थन मूल्य को शामिल कर लिया जाए। सरकार बार-बार कह रही है कि न्यूनतम समर्थन मूल्य जारी रहेगा फिर किसानों को आंदोलन क्यों करना पड़ रहा है? क्या किसान सरकार पर भरोसा नहीं कर पा रहा है। नीति आयोग के सदस्य रमेश चंद ने भी कहा है कि आंदोलन कर रहे किसान नए कृषि कानूनों को पूरी तरह समझ नहीं पाए हैं।
कोरोना काल में देशव्यापी लाकडाउन के बीच जब किसान अध्यादेश संसद ने पास किए थे, तब से किसान इसका विरोध कर रहे हैं। कृषि कानूनों को लेकर पिछले माह पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह अपने सभी विधायकों के साथ राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद से मिलना चाहते थे, लेकिन मुलाकात के लिए समय नहीं दिया गया। किसान आंदोलन को लेकर राजनीति भी खूब हो रही है।
हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर आरोप लगा चुके हैं कि केंद्र के कृषि कानूनों के खिलाफ कुछ राजनीतिक दल एवं संगठन किसान आंदोलन को प्रायोजित कर रहे हैं। इस मामले में सरकार को बातचीत का रास्ता पहले ही अपनाना चाहिए था।
सवाल है कि क्या सिर्फ किसानों पर कोरोना की गाइडलाइन लागू होती है? किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में सरकार के धुर विरोधी व्यक्ति को भी अपनी बात कहने, विरोध प्रदर्शन करने और सत्ता के केंद्रों के बाहर एकत्र होकर सामूहिक दबाव बनाने का संवैधानिक अधिकार है। ये अधिकार किसानों को भी है। आखिरकार किसान आंदोलन पर सरकार हरकत में आ गई है।
केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने कहा है कि केंद्र सरकार किसानों की हर समस्या और मांग पर चर्चा करने को राजी है। केंद्र 3 दिसंबर को किसानों के साथ बातचीत करेगा, अगर वे उससे पहले वार्ता चाहते हैं तो उन्हें सरकार द्वारा तय जगह (बुराड़ी ग्राउंड) पर जाना होगा। हालांकि किसान संगठनों ने बुराड़ी ग्राउंड में इकट्ठा होकर वार्ता करने के केंद्रीय गृह मंत्री के प्रस्ताव को ठुकरा दिया।
बहरहाल, किसानों के मुद्दे को राजनीतिक रंग न देते हुए बातचीत से इस मसले का हल निकाला जाना चाहिए। कोई भी मुद्दा इतना बड़ा नहीं होता कि बातचीत से उसका हल न निकले। सरकार को इस मामले की संवेदनशीलता को समझना चाहिए।
