शब्द रंग : मां... मेरी मां से मिला दो मुझे
12 साल के बच्चे की पीड़ा भरी ममता की पुकार ने शीर्ष अदालत को अपना फैसला बदलने के लिए किया बाध्य
मां... मेरी मां... मुझे तुमको देखना है। मैं तुम्हारे पास आना चाहता हूं। तुम्हारे बिना मैं बहुत अकेला हूं, कभी-कभी डर जाता हूं। ...मां मुझे अपने पास बुला लो, मेरे आंसू पोंछ दो। मैं तुम्हारी गोद में सर रखकर सोना चाहता हूं, तुमसे लिपटना चाहता हूं। तुम नहीं हो तो, मैंने ड्राइंग की कॉपी में रंग भरना छोड़ दिया है। अक्सर गुस्सा हो जाता हूं। खाना भी नहीं खाता हूं। मेरा घर तो तेरी बाहें है...मां... दोनों हाथ फैलाकर बुला लो मां...
12 साल के बच्चे की इस पीड़ा भरी ममता की पुकार ने आखिरकार देश के सर्वोच्च न्यायालय को अपना फैसला बदलने के लिए बाध्य कर दिया। खुली अदालत में हुई सुनवाई की दुर्लभ घटना के बाद न्यायालय ने बच्चे को फिर से अंतत: उसकी मां को सौंप दिया। मामला यह था कि केरल के एक दंपति ने साल 2011 में शादी की थी। अगले वर्ष 2012 में उनको बेटा हुआ। लेकिन इसी के बाद पति-पत्नी में अलगाव हो गया। संबंध विच्छेद होने पर कोर्ट ने बच्चे की कस्टडी उसकी मां को दे दी।
बच्चे की मां ने साल 2016 में दूसरी शादी कर ली। उसके दूसरे पति के पहले से ही दो बच्चे थे। दूसरे पति से महिला ने एक और बच्चे को जन्म दिया। इन परिस्थितियों के बावजूद बच्चा अपनी मां के साथ खुश था। लेकिन बात तब बिगड़ी जब बच्चे के पहले पिता ने अदालत में उसकी कस्टडी के लिए गुहार लगाई। बच्चे के पिता का कहना था कि उसे साल 2019 तक अपने बेटे के बारे में कुछ पता नहीं था। लेकिन अचानक बच्चे की मां ने कुछ कागजातों के लिए उन्हें फोन किया। जानकारी करने पर पता चला कि वह अपने दूसरे पति और बच्चों के साथ मलेशिया जाने की तैयारी कर रही है। पिता ने यह भी कहा कि बच्चे का धर्म हिंदू से बदलकर ईसाई कर दिया गया है।
यह सब उसकी जानकारी के बिना हुआ। इसके बाद पिता ने बच्चे की कस्टडी के लिए फैमिली कोर्ट में अर्जी दी, लेकिन कोई मदद नहीं मिली। इस पर उसने हाई कोर्ट में अपील की। हाईकोर्ट ने बच्चे की कस्टडी पिता को सौंप दी। बच्चा अपने पिता के पास आ गया। मां ने इस आदेश के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में गुहार लगाई, लेकिन 11 माह पहले सुप्रीम कोर्ट ने केरल उच्च न्यायालय के उस फैसले को बरकरार रखा, जिसमें बच्चे की कस्टडी स्थायी रूप से मां से जैविक पिता को सौंप दी गई थी। इसके पीछे कोर्ट का मानना था कि विदेश जाने से 12 वर्षीय बच्चे का स्थिर जीवन अस्त-व्यस्त हो जाएगा।
उधर बच्चा अपने जैविक पिता के पास असहज और असमान्य परिस्थितियों का सामना कर रहा था। इसे देखते हुए मां ने सुप्रीम कोर्ट से फैसले की समीक्षा की मांग करते हुए कहा कि वह बचपन से बच्चे की मुख्य देखभालकर्ता रही हैं। बच्चा अपने पिता को बहुत कम जानता है। वह कभी-कभार ही उससे मिले हैं। बच्चे पर न्यायालय के फैसले का गहरा असर पड़ा है। वह चिंता और भय में जी रहा है। मां ने इस संबंध में क्रिश्चियन मेडिकल कॉलेज, वेल्लोर की मूल्यांकन रिपोर्टें भी सामने रखीं, जिनमें कहा गया था कि बच्चे को अपनी मां से दूर होने का डर है, इस कारण वह उदास और अनमना रहता है।
लेखक प्रदीप तिवारी, एडवोकेट
