शब्द रंग : अंधेरों को मिल रही रोशनी यहां से
कानपुर का कृष्णा नगर बना नेत्रदानियों की नगरी, मरणोपरांत 219 नेत्रदान से 438 लोगों की जिंदगी में हुआ उजाला
देश के बंटवारे के बाद पाकिस्तान के डेरावल से आए पंजाबी बिरादरी के लोगों ने वर्ष 1948 में कानपुर में जीटी रोड के किनारे कृष्णा नगर नामक मोहल्ला बसाया था। आज इस इलाके की पहचान रक्तदान के बाद नेत्रदान नगरी के रूप में होती है। यहां के 219 लोगों द्वारा मरणोपरांत किए गए नेत्रदान से अंधता के शिकार 438 लोगों का जीवन रोशन हो चुका है। इस काम के सूत्रधार और प्रेरक पूर्व पार्षद मदन लाल भाटिया के अनुसार पूरे मोहल्ले में जीते-जीते रक्तदान, जाते-जाते नेत्रदान अब ध्येय वाक्य बन चुका है।
मदन लाल बताते हैं कि साल 1981 में जनता की समस्याओं और परेशान व्यक्तियों की सेवा का संकल्प लिया। वायु सेना के रिटायर्ड अधिकारी कुंदनलाल भाटिया ने रास्ता दिखाया। उत्साही और ऊर्जावान युवाओं को जोड़कर श्री नागर जी सेवादल नामक संगठन बनाया। गरीब परिवारों की बेटियों की शादी कराने का बीड़ा उठाया। इसी दौरान एक ऐसी घटना हुई जिसने उद्देश्य ही बदल दिया। क्षेत्र के एक परिवार को जबरदस्त सड़क हादसे के बाद बड़ी मात्रा में रक्त की आवश्यकता पड़ी। लेकिन कुछ परिवारों ने रक्त देने से इनकार कर दिया। इसी के बाद फैसला लिया कि रक्त की कमी से किसी जीवन की क्षति नहीं होने देनी है।
मेडिकल कॉलेज एवं इंडियन मेडिकल एसोसिएशन की टीम बुलाकर इलाके के युवाओं एवं बेटियों के रक्त ग्रुप की जांच कराकर उन्हें रक्तदान के लिए प्रेरित किया। कुछ ही समय में रक्तदानियों की बड़ी टोली तैयार हो गई। इस काम की सफलता से नेत्रदान की प्रेरणा मिली। जब भी इलाके में किसी का देहांत होता तो उसके परिवार को मृतक का नेत्रदान कराने के लिए प्रेरित करना शुरू किया। शुरू में लोग तैयार नहीं हुए। लेकिन पार्षद बनने के बाद रक्तदान और नेत्रदान के काम को मिशन बना लिया। कृष्णा नगर में पहला नेत्रदान वर्ष 2006 में बलदेव राज भाटिया की पत्नी सीता देवी का हुआ। उनके कॉर्निया से दो लोगों को रोशनी मिली।
परिवार की सराहना हुई, नेत्रदान का मिथक टूटा, फिर क्या था नेत्रदान संकल्प पत्र भरने के लिए लोग तेजी से आने लगे। पंजाबियों की परंपरा के अनुसार मरणोपरांत चौथे एवं उठाले की बैठक में नेत्रदाता परिवार को सम्मानित किया जाने लगा। इससे यह स्व: स्फूर्त कार्यक्रम बन गया। अब तो नेत्रदान की सूचना मिलते ही मेडिकल कॉलेज की टीम आकर मृतक के दोनों कॉर्निया सुरक्षित करती है।
इसके बाद अंधता के शिकार दो लोगों को प्रत्यारोपित कर उनके जीवन में रोशनी करती है। इस काम में मेडिकल कॉलेज की प्रोफेसर नेत्र रोग विभागाध्यक्ष डॉक्टर शालिनी मोहन एवं उनकी टीम विशेष सहयोग कर रही है। नेत्रदान अभियान कानपुर के एक दर्जन से ज्यादा मोहल्लों से बाहर निकल कर मुरादाबाद, सीतापुर,हरिद्वार एवं ऋषिकेश जैसे शहरों तक फैल चुका है। प्रदेश सरकार ने भी इसमें पहल करते हुए कानपुर में आई बैंक की स्थापना की है।
लेखन: मदन लाल भाटिया पूर्व पार्षद एवं समाजसेवी
